सरिस्का के घने जंगल के बीच एक पहाड़ी पर 1000 साल से भी पुराना एक शिव मंदिर खड़ा है — और उसके चारों ओर करीब 2 किलोमीटर के दायरे में बिखरे हैं लगभग 200 प्राचीन मंदिरों के अवशेष। अलवर जिले के टहला (राजगढ़ तहसील) के पास स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर को राजस्थान का सबसे रहस्यमय शिवधाम कहा जाए तो गलत नहीं — कभी यहां राज्यपुरा (परानगर) नाम की समृद्ध नगरी बसती थी। सावन में यहां राजस्थान ही नहीं, दिल्ली-हरियाणा-पंजाब तक से श्रद्धालु जलाभिषेक करने पहुंचते हैं।
इतिहास: शिलालेख खुद बताता है उम्र
मंदिर परिसर से मिले 961 ईस्वी के शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य के सामंत महाराजाधिराज मथनदेव (बड़गूजर वंश) ने कराया था — यानी यह 10वीं शताब्दी का प्रतिहारकालीन मंदिर है। करीब 1010 ईस्वी में राजा अजयपाल के दौर में इसमें और मूर्तिशिल्प जुड़े। मुख्य मंदिर त्रिकुट शैली का है — बीच में शिव और अगल-बगल ब्रह्मा-विष्णु से जुड़े गर्भगृह — और इसकी दीवारों पर अप्सराओं, गंधर्वों और मिथुन मूर्तियों की ऐसी बारीक नक्काशी है कि इसे 'राजस्थान का खजुराहो' भी कहा जाता है। पास ही 922-23 ईस्वी की विशाल जैन प्रतिमा वाला नौगजा मंदिर भी है। यह पूरा क्षेत्र पुरातत्व विभाग की देखरेख में संरक्षित है।
मान्यताएं: पांडवकालीन शिवलिंग और रंग बदलने की कथा
स्थानीय मान्यता इस मंदिर को महाभारत काल से जोड़ती है — कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि गर्भगृह का करीब साढ़े चार फीट ऊंचा शिवलिंग नीलम पत्थर का है और सावन-शिवरात्रि पर दिन में तीन बार रंग बदलता प्रतीत होता है। खंडहर हुए 200 मंदिरों के बारे में किंवदंती है कि आक्रमणकारी सेना को मधुमक्खियों के झुंड ने खदेड़ा था, तभी मुख्य मंदिर बच सका। ये सब आस्था की कथाएं हैं — पर हजार साल के पत्थरों के बीच खड़े होकर इन्हें सुनने का अनुभव ही अलग है।
कैसे पहुंचें
| कहां से | रास्ता |
|---|---|
| अलवर से | करीब 65-70 किमी — राजगढ़ होते हुए टहला; निकटतम रेलवे स्टेशन अलवर जंक्शन |
| जयपुर से | करीब 110 किमी — दौसा-भानगढ़ की ओर से टहला मार्ग |
| आखिरी चढ़ाई | टहला से मंदिर तक करीब 2 किमी की कच्ची-पथरीली चढ़ाई — SUV/बाइक बेहतर; पैदल भी जा सकते हैं |
मंदिर सरिस्का टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में है — दर्शन के लिए सफारी परमिट की जरूरत नहीं होती, पर रास्ता वन क्षेत्र से गुजरता है, इसलिए अंधेरा होने से पहले लौटना अनिवार्य है। मंदिर आमतौर पर दिन में खुला रहता है और शाम करीब 5 बजे की आरती के बाद कपाट बंद हो जाते हैं (महाशिवरात्रि पर रातभर खुलता है)। रास्ते में खाने-पानी की सुविधा नहीं है — पानी साथ रखें। जाने से पहले स्थानीय स्तर पर मौसम व रास्ते की स्थिति की पुष्टि कर लें — मानसून में कच्चा रास्ता फिसलन भरा हो सकता है।
कब जाएं
सावन यहां का सबसे बड़ा मौसम है — सोमवार और शिवरात्रि पर मेले जैसा माहौल रहता है (सावन शिवरात्रि 11 अगस्त को जलाभिषेक की मुख्य तिथि है)। घूमने के लिहाज से मानसून के ठीक बाद और सर्दियों (अक्टूबर-मार्च) का मौसम सबसे सुहावना है — हरियाली से ढके अरावली के बीच यह सफर अपने-आप में यादगार है। पास ही भानगढ़ और सरिस्का भी हैं — एक दिन में तीनों की योजना बन सकती है। सावन के और शिवधामों व व्रत-तिथियों के लिए सावन व्रत सूची और हरियाली अमावस्या (12 अगस्त) देखें; अलवर के आसपास की और जगहों के लिए मानसून में घूमने की जगहें पढ़ें।
⚠️ नोट: ऐतिहासिक तथ्य शिलालेख-आधारित प्रकाशित विवरणों से हैं; पांडवकालीन स्थापना, नीलम शिवलिंग व रंग बदलने की बातें स्थानीय मान्यताएं हैं। मंदिर के खुलने के समय में स्रोतों में अंतर है — दूर से जा रहे हों तो स्थानीय पुजारी/प्रशासन से समय की पुष्टि कर लें।






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