सीधा जवाब: राजस्थान में खेती की साझा जमीन का बंटवारा राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 53 से होता है, दो में से किसी एक तरीके से: सभी सह-खातेदारों की सहमति से, या सहायक कलक्टर (SDO) की अदालत में बंटवारे का वाद दायर करके, जिसकी कोई समय-सीमा नहीं है। पुश्तैनी खेती की जमीन के पंजीकृत विभाजन विलेख पर IGRS की तालिका में स्टाम्प ड्यूटी 0 और पंजीयन फीस 0 लिखी है। बंटवारे के बाद हर नए खाते का नामांतरण ₹20 में होता है। खेत की सीमा पर विवाद न हो और बस पत्थर या निशान चाहिए, तो सीमाज्ञान का आवेदन तहसीलदार को जाता है, फीस ₹100 (5 एकड़ तक)। सीमा पर विवाद हो तो फैसला भू-अभिलेख अधिकारी (कलक्टर) करते हैं।
जयपुर। पिता के नाम की जमीन जब बेटों-बेटियों के नाम चढ़ती है, तो जमाबंदी में सबका नाम एक ही खाते में साझा दर्ज होता है। कागज में हर किसी का हिस्सा लिखा होता है, पर खेत में किसका टुकड़ा कौन-सा है, यह तय नहीं होता। इसी को तय करना बंटवारा है। और जब पड़ोसी खेत से या आपस में मेड़ को लेकर उलझन हो, तो खेत की नाप-जोख करके सीमा के निशान लगवाना सीमाज्ञान (सीमांकन) कहलाता है। दोनों की धारा, अफसर, फीस और तरीका नीचे अधिनियम और नियमों की कॉपी के साथ है।
आज की स्थिति (25 अक्टूबर 2026): बंटवारे की धारा 53 और सीमा विवाद की धारा 128 में कोई नया बदलाव हमें नहीं मिला। सहमति से बंटवारा आसान करने या राजस्व शिविरों में बंटवारा-सीमाज्ञान निपटाने का 2024 से 2026 के बीच का कोई आदेश भी हमें नहीं मिला, इसलिए यहां उसका जिक्र नहीं है। फीस और स्टाम्प की जो दरें नीचे हैं, वे राजस्व विभाग के भू-अभिलेख नियमों की 2023 तक अद्यतन प्रति, IGRS की 21 नवंबर 2024 से लागू शुल्क तालिका और वित्त विभाग की 11 फरवरी 2026 की सरचार्ज अधिसूचना से हैं। रजिस्ट्री से पहले उप-पंजीयक कार्यालय में मौजूदा दर एक बार पूछ लें।
एक नजर में: बंटवारा और सीमाज्ञान
| बंटवारा (सहमति से) | बंटवारा (वाद से) | सीमाज्ञान (विवाद नहीं) | सीमा विवाद | |
|---|---|---|---|---|
| कानून | काश्तकारी अधिनियम, धारा 53(2)(i) | काश्तकारी अधिनियम, धारा 53(2)(ii) | भू-राजस्व अधिनियम, धारा 128 का परंतुक; भू-अभिलेख नियम 34 | भू-राजस्व अधिनियम, धारा 128 और 111 |
| कहां | उप-पंजीयक (विलेख की रजिस्ट्री), फिर तहसील (नामांतरण) | सहायक कलक्टर (SDO) की अदालत | तहसीलदार | भू-अभिलेख अधिकारी (कलक्टर) |
| समय-सीमा | लागू नहीं | कोई नहीं (तीसरी अनुसूची) | नियमों में तय नहीं | नियमों में तय नहीं |
| सरकारी शुल्क | पुश्तैनी कृषि भूमि: स्टाम्प 0, पंजीयन 0, स्कैनिंग ₹300 | कोर्ट फीस (अदालत से पूछें) | ₹100 / ₹200 / ₹400, रकबे के हिसाब से | - |
| बाद में | हर नए खाते का नामांतरण, ₹20 प्रति खाता | पत्थर/निशान खातेदार अपने खर्च पर लगाता और संभालता है (धारा 129) | ||
1. बंटवारा: धारा 53 के दो रास्ते
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 53(2) कहती है कि किसी खाते (holding) का बंटवारा दो ही तरह से होगा। पहला, सह-खातेदारों के बीच समझौते से: समझौते में यह तय हो कि जमीन कैसे बंटेगी और लगान किस हिस्से पर कितना रहेगा। दूसरा, सक्षम अदालत की डिक्री या आदेश से, जो एक या ज्यादा सह-खातेदारों के दायर किए वाद में दी जाती है। धारा 53(4) के अनुसार ऐसे हर वाद में सभी सह-खातेदार और भू-धारक (जिसे लगान दिया जाता है) पक्षकार बनाए जाने जरूरी हैं, और 53(5) के अनुसार पक्षकार वही हों तो एक से ज्यादा खातों का बंटवारा एक ही वाद में मांगा जा सकता है।

सहमति से बंटवारा
अगर जमाबंदी में दर्ज सभी सह-खातेदार राजी हैं, तो अदालत जाने की जरूरत नहीं। सब मिलकर तय करते हैं कि कौन-सा खसरा या उसका कौन-सा टुकड़ा किसे मिलेगा, और उसे विभाजन विलेख (partition deed) में लिखकर उप-पंजीयक के यहां रजिस्ट्री कराते हैं। IGRS की 2019 की शुल्क तालिका में विभाजन विलेख का पंजीयन "Compulsory" यानी अनिवार्य लिखा है। रजिस्ट्री के बाद हर भाई या बहन के नए खाते के लिए तहसील में नामांतरण होता है, तभी जमाबंदी में अलग-अलग खाते बनते हैं।
वाद से बंटवारा
अगर कोई एक सह-खातेदार राजी नहीं है, तो बाकी में से कोई भी बंटवारे का वाद दायर कर सकता है। अधिनियम की तीसरी अनुसूची में "Suit for division of holding" के सामने समय-सीमा "None" और सुनवाई करने वाली अदालत "Assistant Collector" लिखी है। अधिनियम की परिभाषा के अनुसार उपखंड अधिकारी (SDO) वही सहायक कलक्टर है जिसे एक या ज्यादा उपखंडों का प्रभार दिया गया है। धारा 207 के अनुसार ऐसे वाद सिर्फ राजस्व अदालत सुनती है, सिविल कोर्ट नहीं, और धारा 208 के अनुसार इन पर सिविल प्रक्रिया संहिता लागू होती है।

धारा 53(2)(ii) के अनुसार अदालत की डिक्री खाते को हिस्सों में बांटती है और हर हिस्से पर लगान का बंटवारा तय करती है। बंटवारे का अंतिम आदेश जब मंजूर होकर लागू हो जाता है, तो भू-अभिलेख नियमों के नियम 126 के अनुसार उसकी प्रविष्टि बाकी नामांतरणों की तरह दर्ज और प्रमाणित होती है।
अपील: सहायक कलक्टर या SDO की डिक्री के खिलाफ पहली अपील राजस्व अपील प्राधिकारी के पास (धारा 223), और उसके फैसले पर दूसरी अपील धारा 224 में लिखे आधारों पर बोर्ड के पास जाती है। राजस्थान वित्त अधिनियम 2026 (राजपत्र, 27 मार्च 2026) ने राजस्व मंडल का नाम बदलकर "Rajasthan Revenue and Tax Board" कर दिया है।
2. स्टाम्प ड्यूटी: पुश्तैनी खेत पर 0, खरीदी जमीन पर 3%
राजस्थान स्टाम्प अधिनियम 1998 की अनुसूची के अनुच्छेद 42 में विभाजन के लिखत पर वही ड्यूटी है जो बेचान (conveyance) पर, पर सिर्फ अलग किए गए हिस्सों के मूल्य पर। अनुच्छेद 42 के नोट के अनुसार बंटवारे के बाद बचा सबसे बड़ा हिस्सा वह माना जाता है जिससे बाकी हिस्से अलग हुए, यानी ड्यूटी उस सबसे बड़े हिस्से पर नहीं लगती। फिर सरकार की छूट (rebate) लगती है। IGRS की 21 नवंबर 2024 से लागू तालिका में अनुच्छेद 42 की तीन पंक्तियां हैं:

| दस्तावेज | स्टाम्प ड्यूटी (छूट के बाद) | पंजीयन फीस (छूट के बाद) |
|---|---|---|
| पुश्तैनी कृषि भूमि का विभाजन विलेख | 0 | 0 |
| पुश्तैनी संपत्ति का विभाजन विलेख | 0 | अधिकतम ₹1,000 |
| गैर-पुश्तैनी संपत्ति का विभाजन विलेख | बाजार मूल्य का 3% | 0.25%, अधिकतम ₹10,000 |
तीनों पर ₹300 स्कैनिंग (CSI) फीस अलग है। जहां स्टाम्प ड्यूटी बनती है (जैसे गैर-पुश्तैनी विलेख पर), वहां ड्यूटी पर सरचार्ज भी लगता है: धारा 3-A का इन्फ्रास्ट्रक्चर सरचार्ज 11 फरवरी 2026 से 13% है (₹10 लाख तक के मूल्य वाले दस्तावेज पर 10%), और धारा 3-B का 20%। यानी ₹10 लाख से ज्यादा मूल्य पर कुल 33% और ₹10 लाख तक 30%। पुश्तैनी कृषि भूमि पर ड्यूटी 0 है, तो सरचार्ज भी 0। ध्यान रखें: स्टाम्प अधिनियम की धारा 2 में "विभाजन का लिखत" की परिभाषा में राजस्व अदालत का बंटवारे का अंतिम आदेश भी शामिल है, जबकि IGRS तालिका में छूट "Partition deed" के नाम से है। डिक्री पर स्टाम्प कैसे लगेगा, इसका अलग आदेश हमें नहीं मिला, इसलिए वाद वाले मामले में यह वकील या उप-पंजीयक से पहले पूछ लें।
3. बंटवारे के बाद नामांतरण: हर खाते के ₹20
बंटवारा कागज पर तभी पूरा होता है जब जमाबंदी में अलग खाते बन जाएं। भू-अभिलेख नियमों की नामांतरण फीस तालिका (परिशिष्ट II) में "Division of holding under Section 53" की फीस ₹20 प्रति खाता है, और नियम 143 कहता है कि बंटवारे से बने हर खाते की फीस अलग लगेगी, बचे हुए साझा खाते की भी। यानी तीन हिस्से बने तो तीन फीस।

नामांतरण का आवेदन कैसे करें और उसकी स्थिति कैसे देखें, यह हमारी नामांतरण गाइड में है। नामांतरण के बाद जमाबंदी निकालकर जरूर देखें कि हर नाम, हिस्सा और खसरा सही चढ़ा है।
4. सीमाज्ञान: विवाद नहीं तो तहसीलदार, विवाद है तो कलक्टर
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 128 के अनुसार सीमा के सभी विवाद भू-अभिलेख अधिकारी तय करेंगे, उसी तरीके से जो धारा 111 में है। अधिनियम की परिभाषा में भू-अभिलेख अधिकारी कलक्टर हैं, और इसमें अतिरिक्त और सहायक भू-अभिलेख अधिकारी भी शामिल हैं। धारा 111 कहती है कि फैसला जहां तक हो सके मौजूदा सर्वे नक्शों के आधार पर होगा; नक्शे से संभव न हो तो वास्तविक कब्जे के आधार पर, और जांच शुरू होने से पहले तीन महीने के अंदर किसी को गलत तरीके से बेदखल किया गया हो तो संक्षिप्त जांच से तय होगा कि कब्जे का सबसे ज्यादा हकदार कौन है।
धारा 128 के परंतुक के अनुसार अगर खेत की सीमा पर विवाद नहीं है, पर सीमा के सही निशान न होने से विवाद की आशंका है, तो आवेदन तहसीलदार को दिया जा सकता है और वही उसका निपटारा करेंगे। आम बोलचाल में इसी को सीमाज्ञान कहते हैं।

फीस: भू-अभिलेख नियमों के नियम 34(iii) के अनुसार कोई खातेदार या गैर-खातेदार काश्तकार अपने खेत की नाप-जोख और सीमांकन चाहता है, या खेत की परिधि पर सीमा-निशान लगवाना चाहता है, तो वह तहसीलदार को तय फॉर्म में आवेदन करेगा। 2023 तक अद्यतन नियमों में फीस 5 एकड़ तक ₹100, 5 से 10 एकड़ तक ₹200 और 10 एकड़ से ज्यादा पर ₹400 है। नियम 34 में खेत का सर्वे और रिपोर्ट पटवारी के कामों में गिना गया है।

निशान लगने के बाद: धारा 129 के अनुसार गांव, संपत्ति या खेत के धारकों को कानूनी रूप से लगे स्थायी सीमा-निशान अपने खर्च पर संभालने होते हैं। भू-अभिलेख अधिकारी निशान लगाने या ठीक कराने का आदेश दे सकते हैं, और 30 दिन में पालन न हो तो खुद लगवाकर खर्च वसूल सकते हैं। बिना विवाद वाले खेतों में यही कार्रवाई तहसीलदार कर सकते हैं (धारा 129(3))। जानबूझकर सीमा या सर्वे का निशान मिटाने, हटाने या तोड़ने पर धारा 130 में जुर्माने का प्रावधान है।
5. बंटवारा कैसे कराएं, कदम-दर-कदम
- ताजा जमाबंदी निकालें और देखें कि खाते में किन-किन के नाम और कितने-कितने हिस्से दर्ज हैं। विरासत का नामांतरण अभी बाकी है तो पहले वह कराएं; ई-हस्ताक्षरित नकल कैसे मिलती है, यह इस गाइड में है।
- नक्शा देखें: भू-नक्शा से खसरे की शक्ल और रास्ता देखें, ताकि हर हिस्से तक पहुंच रहे।
- सब सहमत हैं: हर व्यक्ति का खसरा या टुकड़ा और लगान का बंटवारा लिखकर विभाजन विलेख बनवाएं, सबके दस्तखत कराएं और उप-पंजीयक के यहां रजिस्ट्री कराएं।
- सहमति नहीं है: सहायक कलक्टर (SDO) की अदालत में धारा 53 का वाद दायर करें, सभी सह-खातेदारों और भू-धारक को पक्षकार बनाकर। कोर्ट फीस अपने वकील या अदालत से पूछें।
- नामांतरण कराएं: रजिस्ट्री या अंतिम आदेश के बाद तहसील में हर नए खाते का नामांतरण, फीस ₹20 प्रति खाता।
- जरूरत हो तो सीमाज्ञान: तहसीलदार को नियम 34 के फॉर्म में आवेदन दें: नाम और पिता का नाम, गांव, पटवार हल्का, खाता नंबर, खातेदार/गैर-खातेदार, खसरा नंबर और रकबा, और मौजूदा सीमा-पत्थरों की हालत।
- आखिर में जांचें: नई जमाबंदी में हर नाम का अलग खाता, सही खसरा और सही रकबा दिख रहा है या नहीं।
6. उदाहरण: तीन भाई, 6 बीघा पुश्तैनी जमीन
मान लीजिए पिता के बाद 6 बीघा खेती की जमीन तीन भाइयों के नाम साझा खाते में चढ़ी है और तीनों बराबर हिस्से पर सहमत हैं।
| हर भाई का हिस्सा | 6 ÷ 3 = 2 बीघा |
| विभाजन विलेख पर स्टाम्प ड्यूटी | 0 (पुश्तैनी कृषि भूमि) |
| पंजीयन फीस | 0 |
| स्कैनिंग (CSI) फीस | ₹300 |
| नामांतरण | 3 नए खाते × ₹20 = ₹60 |
| सीमाज्ञान (पूरे 6 बीघा का एक आवेदन) | ₹100, क्योंकि 6 बीघा 5 एकड़ से कम है (नीचे देखें) |
| कुल सरकारी शुल्क | ₹300 + ₹60 + ₹100 = ₹460 |
बीघा से एकड़: राजस्थान में बीघा हर जगह बराबर नहीं। भू-अभिलेख नियमों के परिशिष्ट I के अनुसार पुराने जयपुर इलाके की 165 फुट की जरीब में 1 एकड़ = 1 बीघा 12 बिस्वा (1.6 बीघा) है, और जोधपुर, बाड़मेर, नागौर जैसे इलाकों की 132 फुट की जरीब में 1 एकड़ = 2½ बीघा। इस हिसाब से 6 बीघा जयपुर के माप में 6 ÷ 1.6 = 3.75 एकड़ और जोधपुर के माप में 6 ÷ 2.5 = 2.4 एकड़ है। दोनों 5 एकड़ से कम, इसलिए सीमाज्ञान फीस ₹100। अगर तीनों भाई अपने-अपने 2 बीघा का अलग आवेदन दें, तो ₹100 × 3 = ₹300।
अगर यही 6 बीघा तीनों ने मिलकर खरीदी होती (पुश्तैनी नहीं), तो विलेख पर 3% ड्यूटी लगती, पर सिर्फ अलग हुए हिस्सों पर। तीनों हिस्से बराबर हैं, तो एक हिस्सा "बचा हुआ सबसे बड़ा हिस्सा" माना जाएगा और ड्यूटी बाकी दो हिस्सों, यानी 4 बीघा के बाजार मूल्य पर बनेगी। उदाहरण के लिए, अगर 1 बीघा का बाजार मूल्य ₹5 लाख हो:
| अलग हुए हिस्सों का मूल्य | 4 × ₹5 लाख = ₹20 लाख |
| स्टाम्प ड्यूटी (3%) | ₹20 लाख × 3% = ₹60,000 |
| सरचार्ज (13% + 20% = 33%, मूल्य ₹10 लाख से ज्यादा) | ₹60,000 × 33% = ₹19,800 |
| पंजीयन फीस (0.25%, अधिकतम ₹10,000) | ₹20 लाख × 0.25% = ₹5,000 |
| स्कैनिंग (CSI) फीस | ₹300 |
| कुल | ₹60,000 + ₹19,800 + ₹5,000 + ₹300 = ₹85,100 |
यहां पंजीयन फीस भी अलग हुए हिस्सों के उसी ₹20 लाख पर जोड़ी है; उप-पंजीयक किस मूल्य पर गिनते हैं, यह रजिस्ट्री से पहले पूछ लें (अधिकतम ₹10,000 ही लगेगी)। अपनी जमीन का DLC मूल्य DLC रेट पेज पर देखें।
7. आम गलतियां
- किसी सह-खातेदार को छोड़ देना: जमाबंदी में जितने नाम हैं (बहनें, मां समेत), समझौते में सबकी सहमति चाहिए, और वाद में सब पक्षकार होंगे (धारा 53(4))।
- सादे कागज पर बंटवारा लिखकर छोड़ देना: IGRS तालिका में विभाजन विलेख की रजिस्ट्री अनिवार्य लिखी है, और पुश्तैनी खेती की जमीन पर इसका सरकारी खर्च सिर्फ ₹300 स्कैनिंग फीस है।
- बंटवारे के बाद नामांतरण न कराना: विलेख या डिक्री हाथ में होने पर भी, जब तक नामांतरण न हो, जमाबंदी में साझा खाता ही दर्ज रहता है। नियम 126 के अनुसार बंटवारे का आदेश नामांतरण की तरह ही दर्ज होता है।
- विवाद को सीमाज्ञान समझना: तहसीलदार सिर्फ बिना विवाद वाली सीमा का काम करते हैं। पड़ोसी मेड़ पर दावा कर रहा है, तो मामला धारा 128 में भू-अभिलेख अधिकारी के पास जाता है।
- पत्थर हटाना या मेड़ खिसकाना: सीमा-निशान संभालना खातेदार की जिम्मेदारी है (धारा 129), और जानबूझकर निशान हटाने पर धारा 130 में जुर्माना है।
8. ऑनलाइन क्या होता है
नामांतरण का आवेदन अपना खाता पोर्टल से ऑनलाइन होता है (तरीका हमारी नामांतरण गाइड में)। बंटवारे का वाद या सीमाज्ञान ऑनलाइन दायर हो सकता है या नहीं, और राजस्व अदालत के मुकदमे की स्थिति कहां दिखती है, यह हम 25 अक्टूबर 2026 को सत्यापित नहीं कर पाए: उस दिन राजस्थान सरकार की राजस्व वेबसाइटें हमारी जांच में खुल नहीं रही थीं। ऊपर के नियम तहसीलदार को लिखित आवेदन और SDO अदालत में वाद की बात करते हैं। पुष्टि होते ही यह हिस्सा अपडेट होगा।
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स्रोत: राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 (धारा 53, 207, 208, 223, 224 और तीसरी अनुसूची); राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 (धारा 111, 128, 129, 130); राजस्थान भू-राजस्व (भू-अभिलेख) नियम 1957, 2023 तक अद्यतन (नियम 34, 126, 143, परिशिष्ट I और II); IGRS राजस्थान की स्टाम्प ड्यूटी और पंजीयन फीस तालिका (21.11.2024 से लागू); IGRS शुल्क तालिका (2019), जिसमें विभाजन विलेख का पंजीयन अनिवार्य लिखा है; राजस्थान स्टाम्प अधिनियम 1998, IGRS की प्रति (धारा 2 और अनुसूची का अनुच्छेद 42); राजस्थान वित्त अधिनियम 2026, राजपत्र 27 मार्च 2026 (धारा 5: सरचार्ज 13%; धारा 19 से 21: बोर्ड का नया नाम); वित्त विभाग अधिसूचना F.4(2)FD/Tax/2026-132, 11.02.2026 (धारा 3-A का 13% सरचार्ज); IGRS शुल्क तालिका, 01.05.2024 से लागू (स्टाम्प ड्यूटी पर सरचार्ज 10+20 = 30%, जिसमें 20% धारा 3-B का)। कवर फोटो: बीकानेर के पास एक फार्म के खेत (2019), Jakub Hałun, विकिमीडिया कॉमन्स, CC BY-SA 4.0। Rajasthan365 राजस्व विभाग की वेबसाइट नहीं है; रजिस्ट्री, वाद या आवेदन से पहले तहसील, उप-पंजीयक या अपने वकील से ताजा स्थिति पूछें।







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