📄 सीधा जवाब (7 अगस्त 2026): किरायानामा 11 महीने का इसलिए बनता है कि 1 साल या ज्यादा के रेंट एग्रीमेंट का रजिस्ट्रेशन कानूनन अनिवार्य है — 11 महीने वाला इस खर्च-प्रक्रिया से बाहर रहता है। बनवाने का तरीका: नॉन-ज्यूडिशियल स्टांप पर शर्तें लिखें → दो गवाह → नोटरी (आम चलन) — और मकान मालिक के लिए किरायेदार का पुलिस सत्यापन अलग से जरूरी। कब रजिस्ट्रेशन ही सही रास्ता है, नीचे साफ किया है।

जयपुर। शहर बढ़ रहे हैं, किराए के मकान-दुकान बढ़ रहे हैं — पर किरायानामा आज भी ज्यादातर लोग 'जैसा वकील साहब ने कहा' के भरोसे बनवाते हैं। तीन सवाल हर बार उठते हैं: 11 महीने का ही क्यों, नोटरी काफी है या रजिस्ट्रेशन कराएं, और स्टांप कितने का? तीनों के जवाब नियम समेत नीचे हैं।

11 महीने का रहस्य — एक कानूनी लाइन

  • रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत 1 साल या उससे ज्यादा अवधि की लीज/किरायानामा रजिस्टर कराना अनिवार्य है — यानी उप-पंजीयक कार्यालय (SRO) की प्रक्रिया, स्टांप ड्यूटी और पंजीयन फीस।
  • 11 महीने का एग्रीमेंट इस सीमा के नीचे रहता है — इसीलिए यह देशभर का चलन बन गया: कम खर्च, कम प्रक्रिया, और अवधि पूरी होने पर नया एग्रीमेंट।
  • ध्यान रहे: 11 महीने का मतलब 'कच्चा कागज' नहीं — सही स्टांप, साफ शर्तें और गवाहों के साथ बना किरायानामा विवाद में पूरा काम करता है।

किरायानामे में क्या-क्या लिखा होना चाहिए

हिस्साक्या साफ लिखें
पक्ष और संपत्तिमालिक-किरायेदार के नाम-पते (आधार अनुसार), मकान/दुकान का पूरा पता
पैसामासिक किराया, सिक्योरिटी राशि और उसकी वापसी की शर्त, किराया देने की तारीख
अवधि11 महीने (शुरू-खत्म तारीख), सालाना बढ़ोतरी (आम चलन 5-10%)
नोटिसदोनों तरफ से खाली कराने/छोड़ने का नोटिस पीरियड (आम तौर पर 1 महीना)
खर्चेबिजली-पानी-मेंटेनेंस किसके जिम्मे; मीटर रीडिंग शुरू की लिखें
अन्यमरम्मत, सब-लेटिंग (आगे किराए पर देना) मना, इस्तेमाल का मकसद (घरेलू/व्यावसायिक)

नोटरी बनाम रजिस्टर्ड — कौन-सा कब

  • नोटरीकृत (11 महीने): घरेलू किराएदारी का सामान्य रास्ता — नॉन-ज्यूडिशियल स्टांप पर एग्रीमेंट + दो गवाह + नोटरी सील। खर्च कम, काम तुरंत।
  • रजिस्टर्ड (epanjiyan/SRO): 1 साल+ की अवधि पर अनिवार्य; और बड़ी सिक्योरिटी राशि, कमर्शियल दुकान-शोरूम, या लंबे भरोसे के रिश्ते में वैकल्पिक पर समझदारी — कोर्ट में रजिस्टर्ड दस्तावेज की टक्कर का सबूत कोई नहीं। स्टांप ड्यूटी किराए-अवधि से बनती है — गणना पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग (epanjiyan.rajasthan.gov.in) पर उपलब्ध है।
  • सिर्फ मौखिक/सादे कागज पर — दोनों पक्षों के लिए जोखिम: किराया-बढ़ोतरी से लेकर सिक्योरिटी-वापसी तक हर विवाद 'उसने कहा-मैंने कहा' बन जाता है।

मकान मालिक की चेकलिस्ट (एग्रीमेंट से आगे)

  • किरायेदार का पुलिस सत्यापन — RajCop Citizen ऐप/पुलिस पोर्टल से Tenant Verification; कई शहरों में अनिवार्य है और न कराने पर किरायेदार के अपराध में मालिक की भी जवाबदेही बन सकती है — पुलिस सत्यापन की पूरी गाइड
  • किराया बैंक/UPI से लें — लेन-देन का रिकॉर्ड ही सबसे सस्ता वकील है।
  • मकान की मिल्कियत के कागज दुरुस्त रखें — नामांतरण और पट्टे के बिना किराया-विवाद में दावा कमजोर पड़ता है।

किरायेदार की चेकलिस्ट

  • सिक्योरिटी राशि एग्रीमेंट में अंकों-शब्दों दोनों में लिखवाएं, वापसी की शर्त समेत — सबसे ज्यादा झगड़े इसी पर होते हैं।
  • मालिक की ID और संपत्ति के कागज की कॉपी लें — आगे गैस/बैंक/स्कूल के पते के प्रमाण में किरायानामा तभी मजबूत चलता है।
  • हर महीने का किराया-रिकॉर्ड (UPI नोट में 'Rent + महीना') रखें।

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