पराली से रोशन हो रहा झुंझुनूं:हर महीने बन रही 1 करोड़ यूनिट से ज्यादा 'ग्रीन बिजली', झुंझुनूं का यह मॉडल पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल
आमतौर पर खेती का वेस्टेज यानी 'पराली' किसानों और पर्यावरण के लिए एक बड़ी समस्या मानी जाती है, लेकिन झुंझुनूं जिले ने इस समस्या को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है। जिले में मंड्रेला रोड पर लगा एक आधुनिक बायोमास पावर प्लांट अब पराली से बड़े पैमाने पर बिजली का उत्पादन कर रहा है। यह प्लांट न सिर्फ जिले की बिजली की जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि प्रदूषण को कम करने में भी वरदान साबित हो रहा है।
हर महीने 1 करोड़ 5 लाख यूनिट बिजली का उत्पादन
अजमेर विद्युत वितरण निगम झुंझुनूं के अधीक्षण अभियंता (SE) महेश टीबड़ा ने बताया कि जिले के लिए यह एक बहुत बड़ा अचीवमेंट है। इस बायोमास आधारित प्लांट से हर महीने लगभग 1 करोड़ 5 लाख यूनिट बिजली का शानदार प्रोडक्शन हो रहा है।
प्रदूषण भी खत्म और बिजली भी मुफ्त जैसी
इस प्लांट की सबसे खास बात इसकी कार्यप्रणाली है। खेतों में फसल कटाई के बाद जो पराली या कृषि अवशेष बच जाते हैं, उन्हें इस प्लांट में लाकर सुरक्षित तरीके से जलाया जाता है और उससे बिजली तैयार की जाती है।
अधीक्षण अभियंता (SE), महेश टीबड़ा ने बताया कि इस तकनीक से जिले को दोहरा फायदा मिल रहा है। पहला यह कि खेतों में पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण अब पूरी तरह नियंत्रित हो गया है, और दूसरा, उसी वेस्टेज का इस्तेमाल करके हमें भारी मात्रा में बिजली मिल रही है। यह जिला प्रशासन और बिजली निगम की एक बहुत बड़ी और सफल योजना है।
झुंझुनूं का ग्रीन एनर्जी मॉडल
जिले की आत्मनिर्भरता में बड़ा कदम
इस बायोमास प्लांट के सुचारू रूप से चलने के बाद से झुंझुनूं में बिजली की पारम्परिक निर्भरता कम हुई है। SE टीबड़ा ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले कृषि कचरे को अब एक उपयोगी संसाधन में बदल दिया गया है, जिससे स्थानीय किसानों को भी अपने कृषि वेस्टेज का सही निस्तारण करने का जरिया मिल गया है। बिजली उत्पादन के क्षेत्र में झुंझुनू का यह मॉडल पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल बन रहा है।
क्या पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को पूरी तरह रोका जा सकता है?
हाँ, झुंझुनूं के इस मॉडल से यह साबित हुआ है कि पराली को जलाने के बजाय उसका उपयोग करके बिजली उत्पादन जैसे कामों में किया जा सकता है, जिससे न केवल प्रदूषण कम होता है बल्कि आर्थिक लाभ भी होता है।
बायोमास पावर प्लांट की कार्यप्रणाली
यह प्लांट अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है। इसमें फसल कटाई के बाद बचे हुए कृषि अवशेषों, जैसे पराली, गन्ने की खोई, और अन्य जैविक कचरे का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इन अवशेषों को प्लांट में लाया जाता है, जहां इन्हें नियंत्रित परिस्थितियों में जलाया जाता है। इस दहन से उत्पन्न गर्मी का उपयोग बॉयलर में पानी को भाप में बदलने के लिए किया जाता है। यह उच्च दबाव वाली भाप टरबाइन को घुमाती है, जो जनरेटर से जुड़ा होता है और इस प्रकार बिजली का उत्पादन होता है।
झुंझुनूं का 'ग्रीन बिजली' मॉडल: फायदे और भविष्य
यह मॉडल न केवल पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, बल्कि किसानों के लिए आय का एक अतिरिक्त स्रोत भी बन सकता है। अगर इस मॉडल को पूरे राजस्थान में लागू किया जाए, तो प्रदेश बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक बड़ा कदम उठा सकता है।
किसानों को क्या फायदा?
किसानों को अपनी पराली बेचने का एक नया जरिया मिला है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है। पहले जहां पराली को जलाना एक समस्या थी, वहीं अब यह एक संसाधन बन गया है।
निष्कर्ष
झुंझुनूं का यह बायोमास पावर प्लांट 'ग्रीन एनर्जी' की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। पराली जैसे कृषि अपशिष्ट का उपयोग करके बिजली का उत्पादन करना न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने और राज्य को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में भी सहायक है। यह मॉडल निश्चित रूप से पूरे राजस्थान के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।
स्रोत: GNews:Rajasthan ne


