राजस्थान में आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा में हलचल तेज हो गई है. इस बार तीन सीटों पर चुनाव होना है, जिनमें दो सीटें भाजपा और एक सीट कांग्रेस के खाते में जाने की संभावना मानी जा रही है. भाजपा में संभावित उम्मीदवारों को लेकर कई बड़े नेताओं के नाम चर्चा में हैं. राजेंद्र राठौड़, सतीश पूनिया, ज्योति मिर्धा, कैलाश चौधरी, अलका सिंह गुर्जर और प्रभुलाल सैनी जैसे नेताओं को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं. पार्टी जातीय संतुलन, संगठन निष्ठा और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों के चयन की तैयारी में जुटी हुई है.

बीजेपी के राज्यसभा दावेदार: कौन-कौन हैं रेस में?

जयपुर. राजस्थान में आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा में अंदरखाने हलचल तेज हो गई है. इस बार राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव होना है, जिनमें से दो सीटें भाजपा और एक सीट कांग्रेस के खाते में जाने की संभावना मानी जा रही है. ऐसे में भाजपा में संभावित उम्मीदवारों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. पार्टी जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ संगठन में सक्रिय नेताओं को मौका देने की रणनीति पर मंथन कर रही है. वहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस चुनाव में क्या रुख अपनाती हैं, इस पर भी राजनीतिक गलियारों की नजर बनी हुई है.

राजेंद्र राठौड़ का नाम प्रमुखता से

राज्यसभा की संभावित दौड़ में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है. भाजपा में लंबे समय से सक्रिय राठौड़ को उत्तर भारत के बड़े राजपूत नेताओं में गिना जाता है. हाल ही में पश्चिम बंगाल के भवानीपुर में भाजपा की जीत के बाद उनका कद और बढ़ा है. बताया जाता है कि नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने भी इस जीत का श्रेय राठौड़ को दिया था. ऐसे में संगठन में उनकी पकड़ मजबूत मानी जा रही है.

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सतीश पूनिया और अलका सिंह गुर्जर भी चर्चा में

पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान में हरियाणा भाजपा के प्रभारी सतीश पूनिया का नाम भी संभावित उम्मीदवारों में शामिल है. संगठन और आरएसएस पृष्ठभूमि के कारण पूनिया पार्टी नेतृत्व के भरोसेमंद नेताओं में माने जाते हैं. वहीं भाजपा की राष्ट्रीय सचिव और बांदीकुई की पूर्व विधायक अलका सिंह गुर्जर का नाम भी चर्चा में है. माना जा रहा है कि गुर्जर समाज को साधने के लिए पार्टी इस वर्ग से चेहरे पर दांव खेल सकती है.

नरसी कुल्हारिया और प्रभुलाल सैनी की दावेदारी

बीकानेर के उद्योगपति और समाजसेवी नरसी कुल्हारिया का नाम भी मजबूती से उभर रहा है. वे लंबे समय से सामाजिक गतिविधियों और संगठनात्मक कार्यों से जुड़े रहे हैं. सूत्रों के अनुसार, आरएसएस की ओर से भी उनके नाम को आगे बढ़ाया जा सकता है. इसके अलावा पूर्व मंत्री प्रभुलाल सैनी का नाम भी राज्यसभा की दौड़ में माना जा रहा है. भाजपा संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके प्रभुलाल सैनी माली-सैनी समाज के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं. उन्होंने हाल ही में देवली-उनियारा उपचुनाव में भी टिकट की दावेदारी की थी.

ज्योति मिर्धा और सुमन शर्मा का नाम भी शामिल

भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष और नागौर की पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा का नाम भी फिर चर्चा में है. किसान नेता स्व. नाथूराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा जाट समाज में मजबूत पकड़ रखती हैं. पिछले राज्यसभा चुनाव में भी उनका नाम अंतिम दौर तक चर्चा में रहा था, लेकिन आखिरी समय में टिकट नहीं मिल पाया था. वहीं पूर्व राज्य महिला आयोग चेयरमैन और भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुमन शर्मा का नाम भी संभावित सूची में शामिल बताया जा रहा है. पार्टी में उनकी सक्रिय कार्यकर्ता की छवि रही है.

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कैलाश चौधरी भी रेस में

पश्चिमी राजस्थान के बड़े जाट नेताओं में गिने जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री और बायतु विधायक कैलाश चौधरी का नाम भी चर्चाओं में है. वे बाड़मेर-जैसलमेर से सांसद रह चुके हैं और केंद्र सरकार में कृषि राज्य मंत्री का दायित्व संभाल चुके हैं. वर्तमान में वे भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं. राजस्थान की राजनीति पर करीब से नजर रखने वालों का मानना है कि भाजपा इस बार जातीय संतुलन, संगठन निष्ठा और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर उम्मीदवार तय कर सकती है. ऐसे में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजस्थान भाजपा में राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज होती जा रही है. सवाल यह है कि पार्टी इन समीकरणों को साधते हुए किसे मौका देगी?

निष्कर्ष

राजस्थान में आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा में मंथन जारी है. तीन सीटों में से दो पर पार्टी की जीत की उम्मीद है, जिसके लिए जातीय संतुलन, क्षेत्रीय समीकरण और संगठन निष्ठा को ध्यान में रखते हुए नामों पर विचार किया जा रहा है. राजेंद्र राठौड़, सतीश पूनिया, ज्योति मिर्धा, अलका सिंह गुर्जर, नरसी कुल्हारिया, प्रभुलाल सैनी और कैलाश चौधरी जैसे कई बड़े चेहरे इस दौड़ में शामिल हैं. अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा, जो राजस्थान के राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकता है.