जालोर जिले के बागोड़ा पंचायत समिति अंतर्गत आने वाले खारुआ गांव में पेयजल का संकट इस कदर गहरा गया है कि अब लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव में पिछले 25 दिनों से सरकारी नलों में पानी की एक बूंद तक नहीं टपकी है। भीषण गर्मी और तपते सूरज के बीच, ग्रामीण पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

25 दिनों का लंबा इंतजार, सूखी पड़ी सरकारी टंकियां

खारुआ गांव के लोगों के लिए पिछला लगभग एक महीना किसी सजा से कम नहीं रहा है। गांव में मौजूद सभी सार्वजनिक जल स्रोत, जो कभी इस क्षेत्र की जीवन रेखा हुआ करते थे, अब पूरी तरह सूख चुके हैं। सरकारी टांके जो ग्रामीणों की प्यास बुझाने का मुख्य साधन थे, वे भी धूल फांक रहे हैं। जालोर जिले के सुदूर इलाकों में पेयजल संकट कोई नई बात नहीं है, लेकिन खारुआ में इस बार लापरवाही की हदें पार हो गई हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार विभाग को सूचित किया, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल आश्वासन मिले। 25 दिन का समय बहुत बड़ा होता है, और इतने लंबे समय तक पानी की सप्लाई बंद रहना सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।

महिलाओं का संघर्ष और पशुधन की दुर्दशा

इस जल संकट का सबसे बुरा असर महिलाओं और पशुपालकों पर पड़ा है। गांव की महिलाओं को अब मीलों दूर पैदल चलकर पानी लाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। तपती दुपहरी में सिर पर पानी के घड़े लेकर चलना न केवल शारीरिक कष्ट देता है, बल्कि यह उनके दैनिक जीवन और घर के अन्य कामों को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

वहीं, अगर बात मवेशियों की करें, तो उनकी स्थिति और भी दयनीय है। कृषि और पशुपालन इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के आधार हैं, लेकिन पानी के अभाव में पशुपालक अपने दुधारू पशुओं को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। पशुओं को पानी पिलाने के लिए दूर-दराज के निजी कुओं या टैंकरों पर निर्भरता बढ़ गई है, जिसका सीधा असर पशुपालकों की जेब पर पड़ रहा है। पशुओं के लिए पर्याप्त पानी न होने के कारण उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है, जिससे भविष्य में आर्थिक नुकसान की संभावना भी बढ़ गई है।

पीएचईडी विभाग की चुप्पी और कागजी दावे

जब इस मामले में पीएचईडी (PHED) विभाग के सहायक अभियंता कमलेश पटेल से संपर्क किया गया, तो उनका जवाब भी रटा-रटाया और टालमटोल भरा रहा। विभाग की ओर से अक्सर तकनीकी खराबी या बिजली के वोल्टेज का बहाना बनाया जाता है। हालांकि, सवाल यह है कि यदि समस्या तकनीकी है, तो उसे ठीक करने में 25 दिन का लंबा समय क्यों लग रहा है?

मौजूदा मौसम के मिजाज को देखते हुए, जहां तापमान लगातार बढ़ रहा है, पानी की मांग स्वाभाविक रूप से अधिक होती है। ऐसे समय में विभाग को अधिक सतर्क होना चाहिए था, लेकिन जमीनी हकीकत विभाग के दावों के बिल्कुल उलट है। खारुआ के लोगों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और वे अब सड़कों पर उतरने की चेतावनी दे रहे हैं।

निष्कर्ष

जालोर के खारुआ गांव की यह स्थिति केवल एक गांव की समस्या नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण राजस्थान में पेयजल प्रबंधन की ढुलमुल नीति का प्रतिबिंब है। 25 दिनों तक सप्लाई बंद रहना यह साबित करता है कि स्थानीय स्तर पर निगरानी और जवाबदेही का अभाव है। प्रशासन को चाहिए कि वह तत्काल प्रभाव से टैंकरों के जरिए जलापूर्ति सुनिश्चित करे और पाइपलाइन की मरम्मत का काम युद्ध स्तर पर पूरा करे। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले दिनों में यह संकट और अधिक गंभीर रूप धारण कर सकता है, जिससे ग्रामीणों का पलायन और पशुधन की हानि जैसी बड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।