पाली जिले का बाली उपखंड इन दिनों एक ऐसी खौफनाक दास्तान का केंद्र बना हुआ है, जिसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए। क्षेत्र का बीजापुर गांव, जो अपनी राजनीतिक सक्रियता और विधायक के गृह क्षेत्र के रूप में जाना जाता था, आज एक आदमखोर बंदर के आतंक की छाया में जी रहा है। पिछले एक सप्ताह से यहां स्थिति पूरी तरह बदल गई है। गलियों में चहल-पहल की जगह अब सन्नाटा पसरा रहता है और घरों की छतों पर लोग किसी कैदी की तरह दिन बिताने को मजबूर हैं।

यह स्थिति केवल एक गांव की नहीं है, बल्कि यह एक गहरी प्रशासनिक विफलता की कहानी है। एक ऐसा क्षेत्र जिसे 'वीआईपी' का तमगा हासिल है, वहां के निवासी एक जंगली जानवर से अपनी सुरक्षा की भीख मांग रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

खौफ का मंजर: जब शादियां बनीं जंग का मैदान

बीजापुर में इस बंदर ने दहशत का ऐसा जाल बुना है कि अब लोग अपने घरों से निकलने में भी कतरा रहे हैं। सबसे भयावह स्थिति तब सामने आई जब हाल ही में गांव में एक शादी का आयोजन किया जा रहा था। खुशियों के माहौल में डूबे लोग उस समय स्तब्ध रह गए, जब एक हिंसक बंदर ने अचानक शंकर लाल नामक व्यक्ति पर जानलेवा हमला कर दिया।

हमला इतना अचानक और आक्रामक था कि शंकर लाल को संभलने का मौका तक नहीं मिला। बंदर ने उन्हें बुरी तरह नोच लिया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाना पड़ा, जहां डॉक्टरों को घावों को भरने के लिए 14 टांके लगाने पड़े। इस घटना ने पूरे गांव में डर पैदा कर दिया है। यह सिर्फ एक व्यक्ति का जख्म नहीं है, बल्कि उस डर का प्रतीक है जो अब हर ग्रामीण के मन में घर कर चुका है। शादी-समारोहों के दौरान, जहां लोगों को एकजुट होना चाहिए, वहां अब लोग बंदर के डर से लाठियां और डंडे लेकर चलने को मजबूर हैं।

वन्यजीव-मानव संघर्ष: प्रशासन की लचर व्यवस्था

वन्यजीवों का बस्तियों की ओर रुख करना कोई नई बात नहीं है, विशेषकर पाली जैसे जिलों में, जहां तेजी से होते शहरीकरण ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को छोटा कर दिया है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि जब जंगलों में भोजन और पानी की कमी होती है, तो बंदरों जैसे जानवर रिहायशी इलाकों की ओर रुख करते हैं। हालांकि, प्रशासन का काम इन स्थितियों को नियंत्रित करना होता है।

वन्यजीव संरक्षण प्रोटोकॉल के अनुसार, किसी भी क्षेत्र में 'आदमखोर' या हिंसक जानवर के सक्रिय होने पर वन विभाग की टीम को तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करना चाहिए। इसमें ट्रैंक्विलाइजर गन (बेहोश करने वाली बंदूक), पिंजरे और एक्सपर्ट्स की तैनाती शामिल होती है। लेकिन बीजापुर में स्थिति बिल्कुल विपरीत है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग के अधिकारियों को बार-बार सूचित करने और लिखित शिकायतें देने के बाद भी कोई वनकर्मी सुध लेने तक नहीं आया। ग्रामीणों की शिकायत है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी या किसी की जान जाने का इंतजार कर रहा है?

पढ़ाई और जीवन पर लगा ग्रहण

इस बंदर के आतंक का सबसे बुरा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ रहा है। डर के कारण अभिभावकों ने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है। ग्रामीण बताते हैं कि पिछले सात दिनों से बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित है, क्योंकि वे गली के बाहर कदम रखने से भी डरते हैं। घरों की छतों पर दुबककर दिन बिताने को मजबूर ग्रामीणों की दिनचर्या पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई है।

यह क्षेत्र का 'वीआईपी' स्टेटस होने का दावा भी एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। जब विधायक के अपने गांव में लोग असुरक्षित हैं, तो दूर-दराज के गांवों का क्या हाल होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है। राजनीतिक पहुंच और प्रशासनिक दावों के बीच, बीजापुर के लोग खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। ग्रामीणों का गुस्सा इस बात पर भी है कि जनप्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे पर अब तक चुप्पी साध रखी है, जबकि उन्हें तुरंत हस्तक्षेप कर वन विभाग को कार्रवाई के लिए निर्देशित करना चाहिए था।

निष्कर्ष

बीजापुर गांव में फैला यह बंदर का आतंक एक गंभीर चेतावनी है। वन्यजीवों और मानवीय बस्तियों के बीच बढ़ता टकराव केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरण प्रबंधन की विफलता का परिणाम है। यदि वन विभाग ने समय रहते इस हिंसक जानवर को पकड़कर सुरक्षित जंगल में स्थानांतरित नहीं किया, तो भविष्य में और भी दुखद घटनाएं हो सकती हैं। यह समय का तकाजा है कि प्रशासन अपनी फाइलों से बाहर निकले, जमीनी हकीकत को समझे और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए अविलंब ठोस कदम उठाए, ताकि बीजापुर फिर से सामान्य हो सके और ग्रामीण बिना किसी डर के अपनी सामान्य जिंदगी जी सकें।