आज के दौर में जब एलपीजी सिलेंडर के बढ़ते दाम आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहे हैं, तब राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का एक छोटा सा गांव उम्मीद की नई किरण बनकर उभरा है। हम बात कर रहे हैं मोतीपुर गांव की, जहां के निवासियों ने महंगाई का रोना रोने के बजाय आत्मनिर्भरता का रास्ता चुना है। पिछले चार वर्षों से इस गांव के 120 परिवारों ने बाजार से गैस सिलेंडर खरीदना पूरी तरह बंद कर दिया है। न तो उन्हें गैस खत्म होने का डर सताता है और न ही बुकिंग के लिए कतारों में लगना पड़ता है।
कैसे काम कर रही है मोतीपुर की 'गोबर गैस' क्रांति
मोतीपुर गांव की यह सफलता किसी बड़े तकनीकी चमत्कार से कम नहीं है, लेकिन इसका आधार बेहद सरल है। गांव के लोगों ने बायोगैस प्लांट तकनीक को अपनाया है। राजस्थान जैसे राज्य में, जहां पशुपालन अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, वहां गोबर की उपलब्धता हमेशा प्रचुर मात्रा में रहती है। ग्रामीणों ने इसी संसाधन का सही इस्तेमाल करना सीखा। सरकारी सब्सिडी की सहायता से मात्र 10 हजार रुपये के निवेश में प्रत्येक घर में बायोगैस प्लांट स्थापित किए गए।
यह प्रणाली बहुत ही सरल तरीके से काम करती है। घर के पालतू पशुओं का गोबर और पानी एक निश्चित अनुपात में प्लांट में डाला जाता है। वहां अवायवीय पाचन (anaerobic digestion) की प्रक्रिया से मीथेन गैस बनती है, जो पाइप के जरिए सीधे रसोई तक पहुंचती है। यह गैस एलपीजी की तरह ही खाना पकाने के लिए पर्याप्त ऊर्जा देती है। 120 घरों में यह व्यवस्था सफल होने के बाद अब यह गांव पूरे प्रदेश के लिए एक रोल मॉडल बन गया है। सामान्य वर्ग की खबरों के बीच यह सकारात्मक पहल एक सुखद बदलाव का संकेत है।
आर्थिक बचत और अतिरिक्त आमदनी का जरिया
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति पर पड़ा है। एक मध्यमवर्गीय परिवार साल में एलपीजी सिलेंडर पर हजारों रुपये खर्च कर देता है। मोतीपुर के लोगों ने न केवल इस खर्च को शून्य कर दिया है, बल्कि बायोगैस प्लांट के 'वेस्ट' यानी बचे हुए अवशेषों से भी कमाई का रास्ता ढूंढ लिया है।
प्लांट से निकलने वाली स्लरी या अवशेष, जो कि बेहतरीन जैविक खाद के रूप में काम आती है, उसे किसान अपने खेतों में इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे कृषि में रासायनिक खादों पर होने वाला खर्च भी कम हुआ है। जो किसान पहले यूरिया और डीएपी के लिए बाजार पर निर्भर थे, वे अब अपने ही घर की जैविक खाद का उपयोग कर रहे हैं। इससे जमीन की उर्वरक शक्ति भी बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता में भी सुधार आया है। जो अतिरिक्त खाद बचती है, उसे गांव के अन्य किसान खरीद लेते हैं, जिससे परिवारों को एक अतिरिक्त आय का स्रोत मिल गया है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव
एलपीजी से बायोगैस की ओर शिफ्ट होना सिर्फ पैसों की बचत नहीं है, बल्कि यह एक स्वस्थ जीवनशैली की ओर भी कदम है। पारंपरिक चूल्हों पर लकड़ी या उपले जलाने से निकलने वाला धुआं फेफड़ों के लिए हानिकारक होता है, जो अक्सर ग्रामीण महिलाओं की सेहत बिगाड़ देता है। बायोगैस का धुआं न के बराबर होता है और इससे बर्तनों पर कालिख भी नहीं जमती, जिससे रसोईघर साफ-सुथरा रहता है।
इसके अलावा, यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ी भूमिका निभा रहा है। गांव की सड़कों और गलियों में जो गोबर इधर-उधर पड़ा रहता था, अब उसका उपयोग ऊर्जा बनाने में हो रहा है। इससे गांव में स्वच्छता का स्तर बढ़ा है और मक्खियों व मच्छरों का प्रकोप भी कम हुआ है। यह 'वेस्ट टू वेल्थ' यानी कचरे से कंचन बनाने का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसे सरकार की 'गोबर-धन' योजना के साथ जोड़कर बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।
निष्कर्ष
मोतीपुर गांव की यह कहानी साबित करती है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो संसाधनों की कमी बाधा नहीं बनती। मात्र 10 हजार रुपये के निवेश ने 120 परिवारों को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया है। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट से जूझ रही है, तब राजस्थान का यह छोटा सा गांव पूरी दुनिया को दिखा रहा है कि समाधान हमारे आसपास ही मौजूद है। यदि प्रदेश के अन्य गांवों में भी इस मॉडल को सरकारी प्रोत्साहन के साथ अपनाया जाए, तो न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि पर्यावरण को भी नई संजीवनी मिलेगी। मोतीपुर की यह पहल वाकई में अनुकरणीय है और आने वाले समय में हरित राजस्थान के सपने को साकार करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।





