भारत के शहरी केंद्रों में जलवायु परिवर्तन का खतरा अब महज एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक भयावह वास्तविकता बन चुका है। भीषण गर्मी और लू (हीटवेव) से निपटने के लिए तैयार किया गया ‘हीट एक्शन प्लान’ (HAP) अधिकांश बड़े शहरों में केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है। वर्ष 2016 में जब केंद्र सरकार ने एक महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत दिल्ली, अहमदाबाद, इंदौर, भोपाल, जयपुर और चेन्नई समेत 20 प्रमुख महानगरों में यह योजना लागू की थी, तो उम्मीद थी कि शहर लू के प्रकोप से सुरक्षित हो जाएंगे। लेकिन, एक दशक के करीब होने को आया है और जमीनी हकीकत निराशाजनक है। अहमदाबाद को यदि अपवाद मान लें, तो बाकी 19 शहरों में यह योजना केवल पानी के प्याऊ लगाने और एडवाइजरी जारी करने तक सिमटकर रह गई है।
कागजों पर दम तोड़ती योजना और प्रशासनिक उदासीनता
हीट एक्शन प्लान का मूल उद्देश्य केवल आपातकालीन राहत देना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान खोजना था। इसमें कूल रूफ (छतों को ठंडा रखने वाली कोटिंग), ग्रीन कवर यानी पेड़ों के दायरे को बढ़ाना और गर्मी के प्रति अति-संवेदनशील इलाकों (हॉटस्पॉट) की पहचान करना अनिवार्य था। दुर्भाग्य से, ज्यादातर नगर निकायों ने इन महत्वपूर्ण कदमों को दरकिनार कर दिया।
अस्पतालों में अस्थायी तौर पर 'लू वार्ड' बनाना या गर्मी में कुछ समय के लिए हेल्पडेस्क शुरू कर देना प्रशासन की प्राथमिकता बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश नगर पालिकाओं के पास या तो इस काम के लिए समर्पित फंड की कमी है या फिर इच्छाशक्ति का अभाव। जब तक स्थानीय निकाय जवाबदेह नहीं होंगे और उनके पास क्रियान्वयन के लिए विशेष स्टाफ नहीं होगा, तब तक लू से बचाव के बड़े-बड़े दावे केवल कागजी रिपोर्ट में ही नजर आएंगे।
बढ़ते आंकड़े: एक गंभीर चेतावनी
आंकड़े चीख-चीख कर बता रहे हैं कि हमारे शहर बढ़ती गर्मी के लिए पूरी तरह असुरक्षित हैं। वर्ष 2024 में देश में लू के कारण 56 लोगों की मौत हुई थी और हीट स्ट्रोक के करीब 25 हजार मामले सामने आए थे। यह स्थिति 2025 में और भी भयावह हो गई, जहां मृतकों का आंकड़ा 110 तक पहुंच गया और मरीजों की संख्या बढ़कर 40 हजार के पार हो गई।
यही नहीं, चालू वर्ष 2026 में केवल महाराष्ट्र से अब तक 236 हीट स्ट्रोक के मामले और 6 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। ये संख्याएं दर्शाती हैं कि बढ़ते तापमान और समय के साथ बदलती जलवायु परिस्थितियों के बावजूद हम अपनी तैयारियों को अपडेट नहीं कर रहे हैं।
'अर्बन हीट आइलैंड' और कंक्रीट का जाल
इस समस्या को गहराई से समझने के लिए हमें 'अर्बन हीट आइलैंड' (UHI) प्रभाव को समझना होगा। यह एक वैश्विक रूप से प्रमाणित तथ्य है कि कंक्रीट, डामर और ऊंची इमारतों के सघन जाल के कारण शहर अपने ग्रामीण परिवेश की तुलना में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म रहते हैं। यह कंक्रीट दिनभर गर्मी सोखता है और रात में इसे बाहर निकालता है, जिससे तापमान सामान्य नहीं हो पाता।
अतिरिक्त तथ्य यह है कि शहरों का अनियोजित विस्तार और घटता हुआ ग्रीन कवर इस समस्या को और विकराल बना रहा है। दशकों पहले जिन शहरों में 50-60 प्रतिशत हरा-भरा क्षेत्र हुआ करता था, आज वह सिमटकर 10 प्रतिशत से भी कम रह गया है। एक और महत्वपूर्ण पहलू 'प्रोडक्टिविटी लॉस' है; विश्व बैंक की रिपोर्टों के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के कारण श्रम उत्पादकता में भारी गिरावट आती है। भीषण गर्मी में काम करने की क्षमता कम हो जाती है, जिसका सीधा असर देश की जीडीपी और व्यक्तिगत आय पर पड़ता है, जिसे अक्सर हमारी नीतियों में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
लू के पैमानों में बदलाव की जरूरत
बढ़ती गर्मी और अल-नीनो के प्रभाव को देखते हुए भारतीय मौसम विभाग (IMD) अब लू घोषित करने के अपने पुराने मानकों को बदलने की तैयारी कर रहा है। वर्तमान में लू की घोषणा केवल तापमान के आधार पर की जाती है। हालांकि, यह पैमाना केरल जैसे तटीय राज्यों के लिए पूरी तरह गलत साबित होता है, जहां तापमान भले ही बहुत ज्यादा न हो, लेकिन उमस (Humidity) इतनी अधिक होती है कि शरीर का तापमान नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है।
मौसम वैज्ञानिक अब ‘वेब-बल्ब टेम्परेचर’ (Wet-bulb temperature) और हीट स्ट्रेस को नए मानकों में शामिल करने पर विचार कर रहे हैं। उमस और हवा में नमी का उच्च स्तर सीधे मानव स्वास्थ्य पर हमला करता है, इसलिए नए मानकों में 'ह्यूमिडिटी फैक्टर' का जुड़ना समय की मांग है।
निष्कर्ष
हीट एक्शन प्लान की विफलता सिर्फ एक प्रशासनिक खामी नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट है। जब तक शहर ‘कूल रूफ’ जैसी तकनीकों को अनिवार्य नहीं करेंगे, सार्वजनिक परिवहन में सुधार नहीं करेंगे और हरियाली को कंक्रीट पर प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक लू के आंकड़े बढ़ते ही रहेंगे। प्रशासन को यह समझने की आवश्यकता है कि गर्मी से बचाव का मतलब केवल प्याऊ लगवाना नहीं है, बल्कि शहरों की संरचना को जलवायु के अनुकूल बनाना है। समय आ गया है कि हम अपनी नीतियों को कागजों से निकालकर जमीनी स्तर पर लागू करें, वरना आने वाले वर्षों में भीषण गर्मी का दंश और अधिक लोगों को अपना शिकार बनाएगा।





