राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को लेकर लंबे समय से मंथन चल रहा है। हाल ही में उदयपुर में आयोजित एक बड़े आयोजन के दौरान विधायक गणेश गोगरा ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। गोगरा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आदिवासी समाज हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं है और उन्हें 2026 की जनगणना में एक अलग धर्म कोड (Religion Code) की आवश्यकता है।
इस कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हुए। गोगरा का यह बयान महज एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस लंबी मांग का हिस्सा है जिसे भारत के विभिन्न राज्यों में आदिवासी संगठन लंबे समय से उठा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि आदिवासियों की अपनी प्राचीन परंपराएं, रीति-रिवाज और प्रकृति पूजक संस्कृति है, जो मुख्यधारा के धर्मों से अलग है।
2026 की जनगणना और अलग धर्म कोड की मांग
विधायक गणेश गोगरा की यह मांग आगामी 2026 की जनगणना के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आदिवासी नेताओं का यह तर्क है कि अभी तक की जनगणना में आदिवासियों को या तो 'हिंदू' के रूप में दर्ज किया गया है या फिर 'अन्य' की श्रेणी में रखा गया है। उनका मानना है कि 'अन्य' की श्रेणी में रखे जाने से उनकी वास्तविक जनसंख्या और सांस्कृतिक पहचान का सही आकलन नहीं हो पाता।
आदिवासी संगठनों का कहना है कि यदि उन्हें अलग धर्म कोड मिलता है, तो सरकार को उनकी जनसंख्या के सही आंकड़े मिल सकेंगे। इससे उन्हें शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं के लाभ में अपनी विशिष्ट पहचान के आधार पर हिस्सेदारी मांगने में आसानी होगी। विशेष रूप से डूंगरपुर और बांसवाड़ा जैसे जिलों में, जहां आदिवासी आबादी का घनत्व बहुत अधिक है, इस मांग ने जोर पकड़ लिया है। गोगरा का कहना है कि उनकी संस्कृति प्रकृति के साथ जुड़ी है, जिसे बचाए रखना और उसे संवैधानिक मान्यता दिलाना उनकी प्राथमिकता है।
आदिवासी पहचान बनाम मुख्यधारा का धर्म
यह पहली बार नहीं है जब 'आदिवासी हिंदू हैं या नहीं' इस विषय पर चर्चा छिड़ी है। भारत के जनजातीय इतिहास को देखें तो प्रकृति पूजा, पूर्वजों की पूजा और विशिष्ट त्योहार ही उनकी पहचान रहे हैं। आलोचकों और आदिवासी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि जनगणना में आदिवासियों को हिंदू धर्म के अंतर्गत समेटने से उनकी मूल सांस्कृतिक जड़ें कमजोर होती हैं।
गणेश गोगरा ने अपने संबोधन में इसी बात पर जोर दिया कि आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना, विवाह पद्धति और मृत्यु संस्कार हिंदू धर्म से पूरी तरह भिन्न हैं। इसलिए, उन्हें अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के लिए संवैधानिक अधिकार चाहिए। यह मांग केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी 'सरना धर्म कोड' की मांग के रूप में दशकों से उठती रही है। अब उदयपुर में उठी इस आवाज ने राजस्थान के आदिवासी अंचल में एक नई वैचारिक चेतना को सक्रिय कर दिया है।
राजस्थान की सियासत पर असर
विधायक गणेश गोगरा के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी बढ़ गई है। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में राजनीतिक दलों के लिए यह एक संवेदनशील मुद्दा है। एक तरफ जहां मुख्यधारा की पार्टियां इसे वोट बैंक के नजरिए से देख रही हैं, वहीं आदिवासी नेता इसे अपने अस्तित्व की लड़ाई बता रहे हैं। आने वाले समय में यह मांग चुनाव और नीति निर्धारण में एक बड़ा मुद्दा बन सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ता है, तो आगामी चुनावों में उम्मीदवारों को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। स्थानीय स्तर पर भी आदिवासी संगठन अब एकजुट हो रहे हैं और वे चाहते हैं कि उनके प्रतिनिधि संसद और विधानसभा में इस मांग को मजबूती से रखें। गोगरा का यह बयान न केवल उनके समर्थकों को एकजुट करने का प्रयास है, बल्कि सरकार पर दबाव बनाने की एक रणनीति भी है ताकि केंद्र सरकार जनगणना के प्रारूप में बदलाव पर विचार करे।
निष्कर्ष
विधायक गणेश गोगरा का यह बयान आदिवासी समाज की उस गहरी पीड़ा और आकांक्षा को दर्शाता है, जिसे वे अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखते हैं। 2026 की जनगणना में अलग धर्म कोड की मांग केवल एक प्रशासनिक बदलाव की मांग नहीं है, बल्कि यह अपनी जड़ों को बचाने और उसे मान्यता दिलाने का एक प्रयास है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें इस मांग पर क्या रुख अपनाती हैं और क्या आने वाले समय में आदिवासी समाज को वह संवैधानिक पहचान मिल पाएगी, जिसकी वे मांग कर रहे हैं। फिलहाल, यह मुद्दा राजस्थान के आदिवासी अंचल में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है।





