राजस्थान की राजनीति में महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लेकर घमासान मचा हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा और तीखा हमला बोलते हुए भारतीय जनता पार्टी के महिला सशक्तिकरण के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। गहलोत ने प्रधानमंत्री को एक खुली चुनौती दी है, जो आगामी चुनावों के माहौल में चर्चा का मुख्य विषय बन गई है।

महिला आरक्षण: क्या यह केवल राजनीतिक स्टंट है?

अशोक गहलोत ने अपने हालिया बयान में प्रधानमंत्री मोदी के महिला आरक्षण पर दिए गए भाषणों को महज एक 'चुनावी दांव' करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि केंद्र सरकार महिलाओं के प्रति वाकई इतनी संवेदनशील है और उन्हें विधायिका में उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए गंभीर है, तो उसे बिल को पारित करने के बाद इतना लंबा इंतजार करने की आवश्यकता नहीं थी।

गहलोत का तर्क है कि भाजपा सरकार ने इस बिल को आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर लाया है, ताकि महिलाओं के वोट हासिल किए जा सकें। गहलोत ने चुनौती देते हुए कहा, "अगर आप महिलाओं का समर्थन वाकई प्राप्त करना चाहते हैं और उनके अधिकारों के प्रति इतने ही समर्पित हैं, तो तुरंत लोकसभा भंग करें और देशभर में चुनाव करवाएं। जनता खुद फैसला कर लेगी कि वह किसके साथ है।" उनका यह बयान राजनीतिक हलकों में खलबली मचाने वाला है, क्योंकि उन्होंने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की मंशा और उनके द्वारा पेश किए गए विकास के एजेंडे पर सवाल खड़े किए हैं।

परिसीमन और जनगणना का पेंच: इतिहास की नजर में

महिला आरक्षण बिल को लेकर गहलोत की मुख्य आपत्ति इसके क्रियान्वयन की शर्तों पर है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' का इतिहास काफी पुराना है। 1996 में एचडी देवगौड़ा सरकार के कार्यकाल से ही यह बिल विभिन्न सरकारों के बीच फुटबॉल की तरह घूमता रहा है। यूपीए सरकार के दौरान भी इस बिल को राज्यसभा से पारित कराया गया था, लेकिन लोकसभा में यह सहमति नहीं बना पाया था।

वर्तमान में, भाजपा सरकार द्वारा लाए गए इस बिल में एक अनिवार्य शर्त जोड़ी गई है—जनगणना और परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया का पूरा होना। गहलोत ने इसी तकनीकी पहलू को अपना हथियार बनाया है। उनका तर्क है कि जब तक जनगणना और परिसीमन नहीं होगा, तब तक महिलाओं को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, जो कि एक लंबी प्रक्रिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह शर्त वास्तव में बिल के लागू होने की राह में एक बड़ा प्रशासनिक रोड़ा है। गहलोत ने इसे 'धोखा' करार देते हुए कहा कि सरकार ने एक ऐसा बिल पेश किया है जिसका लाभ महिलाओं को निकट भविष्य में मिलना संदिग्ध है। यह सिर्फ वोट बैंक को साधने का एक सुनियोजित तरीका है।

सरकारी तंत्र और आचार संहिता का उल्लंघन

अशोक गहलोत ने सिर्फ आरक्षण के मुद्दे तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने चुनावी राज्यों में केंद्र सरकार के 'अतिक्रमण' को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, वहां प्रधानमंत्री और अन्य केंद्रीय मंत्रियों के लगातार दौरे हो रहे हैं। इन दौरों के दौरान सरकारी संसाधनों और मशीनरी का जिस तरह से दुरुपयोग किया जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

गहलोत ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी खर्चे पर रैलियां आयोजित करना और सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करके अपनी पार्टी का प्रचार करना आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का खुला उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को इन चीजों पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। उन्होंने दावा किया कि जनता सब कुछ देख रही है और आने वाले चुनावों में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। गहलोत का यह रुख बताता है कि कांग्रेस अब आगामी चुनावों में आक्रामक रणनीति अपनाते हुए भाजपा के हर दांव को काउंटर करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

निष्कर्ष

महिला आरक्षण पर छिड़ी यह बहस महज एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और चुनावी नैतिकता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। एक तरफ भाजपा इसे अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे तकनीकी जटिलताओं में उलझा हुआ एक चुनावी प्रपंच मान रहा है। गहलोत की चुनौती ने इस मुद्दे को और अधिक गरमा दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता आगामी चुनावों में इस 'शक्ति वंदन' और 'चुनावी नैतिकता' के विवाद को किस तरह लेती है और क्या वाकई यह मुद्दा चुनावों के नतीजों पर कोई बड़ा असर डाल पाएगा। लोकतंत्र में इस तरह की खींचतान यह दर्शाती है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच का फासला अब और भी गहरा होता जा रहा है।