राजस्थान के स्वास्थ्य महकमे के लिए पिछले 25 दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं रहे हैं। एक के बाद एक बच्चों की मौतों ने पूरे राज्य में खौफ का माहौल पैदा कर दिया है। पिछले करीब तीन हफ्तों के भीतर 15 बच्चों ने अपनी जान गंवा दी है, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग अब तक इन मौतों के असली कारणों को लेकर अंधेरे में तीर चलाता रहा है।
जब मामला पूरी तरह से हाथ से निकलता हुआ दिखाई दिया, तब जाकर प्रशासन ने पहली बार पोस्टमार्टम करवाने का बड़ा फैसला लिया है। यह कदम भले ही देरी से उठाया गया हो, लेकिन अब उम्मीद है कि चिकित्सा विज्ञान की मदद से मौत के इन कारणों का पता चल सकेगा।
25 दिन, 15 मौतें: स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
किसी भी राज्य के लिए बच्चों की जान जाना एक गंभीर त्रासदी है। राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग के सामने यह चुनौती तब और बड़ी हो गई जब एक निश्चित अवधि में मौतों का आंकड़ा 15 तक पहुंच गया। आम तौर पर ऐसी घटनाओं के बाद विभाग तुरंत अलर्ट मोड पर आता है, लेकिन इस बार जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही थी। शुरुआती दिनों में विभाग न केवल मौतों के कारणों को समझने में विफल रहा, बल्कि बचाव और इलाज की दिशा में भी कोई ठोस रणनीति नहीं बना पाया।
स्थानीय लोगों और पीड़ित परिवारों का आरोप है कि उन्हें समय पर सही जानकारी नहीं दी गई। क्या यह किसी संक्रामक बीमारी का प्रकोप था? या फिर इलाज में हुई देरी? इन सवालों का जवाब देने के बजाय, स्वास्थ्य अधिकारी केवल सतही जांच तक सीमित रहे। जब बात जयपुर से लेकर सुदूर इलाकों तक पहुंचती है, तो स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी खुलकर सामने आ जाती है। 15 बच्चों की मौत केवल एक सांख्यिकी (आंकड़ा) नहीं है, बल्कि यह उन परिवारों के लिए एक कभी न भरने वाला घाव है, जिन्होंने अपना भविष्य खो दिया है।
'अंधेरे में तीर' चलाता रहा सिस्टम, अब पोस्टमार्टम से उम्मीद
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि जब मौतों का सिलसिला अचानक बढ़ जाता है, तो 'डेथ ऑडिट' या पोस्टमार्टम अनिवार्य होना चाहिए। राजस्थान में यही सबसे बड़ी चूक रही। स्वास्थ्य विभाग की टीमें प्रभावित इलाकों में तो पहुंचीं, लेकिन उन्होंने लक्षण के आधार पर ही इलाज करने की कोशिश की। इसे 'अंधेरे में तीर चलाना' ही कहा जाएगा क्योंकि बिना सटीक निदान के बीमारी का इलाज करना खतरे से खाली नहीं होता।
अब प्रशासन ने पहली बार पोस्टमार्टम का निर्णय लिया है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही वह वैज्ञानिक दस्तावेज होगी, जो यह तय करेगी कि बच्चों की मौत किस बीमारी या किन परिस्थितियों के कारण हुई। क्या यह वायरल इंफेक्शन था? क्या दूषित पानी या खानपान का मामला था? या फिर कोई गंभीर मेडिकल नेगलिजेंस? पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद ही जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो पाएगी। हालांकि, इस प्रक्रिया में हुई देरी ने पहले ही बहुत कुछ खो दिया है।
चिकित्सा व्यवस्था में सुधार की तत्काल आवश्यकता
इन मौतों ने राजस्थान की पूरी चिकित्सा व्यवस्था को आईना दिखा दिया है। जब भी ऐसी कोई आपदा आती है, तो राजनीति के गलियारों में बहस तो खूब होती है, लेकिन जमीन पर बुनियादी ढांचे में बदलाव की गति बेहद धीमी रहती है। बच्चों के स्वास्थ्य के लिए समर्पित वार्डों में संसाधनों की कमी, विशेषज्ञों की अनुपलब्धता और समय पर टेस्टिंग किट्स न पहुंच पाना—ये वे कमियां हैं जो अक्सर सामने आती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' को मजबूत करना होगा। यदि पहले ही दिन से मौतों की सही मॉनिटरिंग की गई होती, तो शायद 15 बच्चों की जान बचाई जा सकती थी। अब समय आ गया है कि सरकार केवल मौतों के बाद मुआवजा देने की नीति से आगे बढ़कर, बच्चों की सुरक्षा के लिए एक 'प्रिवेंटिव हेल्थकेयर' मॉडल पर काम करे।
निष्कर्ष
राजस्थान में बच्चों की इन रहस्यमयी मौतों ने साबित कर दिया है कि स्वास्थ्य विभाग को अपनी कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। 25 दिनों का समय बहुत लंबा होता है, और इतने समय में 15 मौतों का होना सिस्टम की विफलता को दर्शाता है। पोस्टमार्टम से जो भी रिपोर्ट सामने आएगी, वह केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि सिस्टम के लिए एक सबक होनी चाहिए। सरकार को अब पारदर्शी जांच सुनिश्चित करनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई करनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी और मां की गोद सूनी न हो। स्वास्थ्य सेवा का अधिकार हर बच्चे का है, और इसे सुरक्षित रखना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।





