मौत को मात देकर तीन लोगों की धड़कन बनीं मोवनदेवी: अंगदान से मिली नई जिंदगी

राजस्थान के जालोर जिले के जसवंतपुरा की रहने वाली 35 वर्षीय मोवनदेवी बागरी ने भले ही दुनिया को अलविदा कह दिया हो, लेकिन उनकी परोपकारी सोच ने उन्हें अमर कर दिया है। एक सड़क दुर्घटना में असमय हुई उनकी मृत्यु के बाद, उनके अंगों ने तीन अलग-अलग लोगों के शरीर में फिर से धड़कना शुरू कर दिया है। दुख की घड़ी में उनके पति वचनारामजी और उनके परिवार द्वारा लिया गया निर्णय समाज के लिए एक बड़ा संदेश है, जो यह बताता है कि मृत्यु के बाद भी जीवन को संवारा जा सकता है।

एक कठिन फैसला: जब सदमे ने दी समझदारी को जन्म

जालोर की मोवनदेवी के साथ घटी सड़क दुर्घटना किसी भी परिवार के लिए एक वज्रपात के समान थी। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें अहमदाबाद के सिविल अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने अथक प्रयास किए, लेकिन अंततः उन्हें 'ब्रेन डेड' (Brain Dead) घोषित कर दिया गया। चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि में, यह स्थिति जीवन का अंतिम पड़ाव होती है।

जब डॉक्टरों ने परिवार को बताया कि मोवनदेवी अब जीवित नहीं हैं, तो उस पल परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अमूमन ऐसी स्थिति में परिवार केवल विलाप करते हैं, लेकिन मोवनदेवी के पति वचनारामजी ने अपने आंसुओं को थामते हुए एक साहसिक फैसला लिया। उन्होंने न केवल अस्पताल के डॉक्टरों को अंगदान के लिए सहमति दी, बल्कि समाज में व्याप्त उन पुरानी धारणाओं को भी तोड़ा जो अंगदान के आड़े आती हैं। वचनारामजी का यह निर्णय साबित करता है कि कठिन परिस्थितियों में लिया गया सकारात्मक कदम किसी अनजान व्यक्ति को जीवन का उपहार दे सकता है।

क्या है 'ब्रेन डेड' और क्यों है यह अंगदान का आधार?

अक्सर आम जनता में 'ब्रेन डेड' और 'कोमा' को लेकर भ्रम की स्थिति रहती है। चिकित्सा विज्ञान में 'ब्रेन डेड' का अर्थ है कि मस्तिष्क के सभी हिस्से, जिसमें ब्रेन स्टेम भी शामिल है, ने काम करना पूरी तरह और स्थायी रूप से बंद कर दिया है। इसे वैज्ञानिक और कानूनी रूप से मृत्यु माना जाता है। ऐसे में कृत्रिम रूप से हृदय की धड़कन और श्वसन को वेंटिलेटर के माध्यम से तब तक बनाए रखा जाता है जब तक कि अंगदान की प्रक्रिया पूरी न हो जाए।

मोवनदेवी के मामले में भी यही हुआ। डॉक्टरों की टीम ने पूरी सावधानी के साथ उनके लीवर और दोनों किडनी को सुरक्षित निकाला और उन मरीजों में प्रत्यारोपित (Transplant) किया, जो लंबे समय से जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। यह एक जटिल प्रक्रिया है, जिसे भारत में एनओटीटीओ (NOTTO - National Organ and Tissue Transplant Organization) जैसे संस्थानों के दिशा-निर्देशों के तहत संचालित किया जाता है।

अंगदान: भारत में एक मूक क्रांति की आवश्यकता

भारत में अंगदान के आंकड़ों पर यदि हम नजर डालें, तो यह स्थिति काफी चिंताजनक है। हर साल लाखों लोग अंग विफलता (Organ Failure) के कारण अपनी जान गवां देते हैं, क्योंकि उन्हें समय पर अंग दाता नहीं मिलते। भारत में प्रति दस लाख आबादी पर अंग दान की दर विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।

मोवनदेवी जैसे लोगों का परिवार जब आगे आता है, तो यह केवल एक अंगदान नहीं होता, बल्कि एक व्यापक सामाजिक जागरूकता का हिस्सा बनता है। अंगदान के बारे में फैली भ्रांतियां, जैसे कि शरीर का अपवित्र हो जाना या शरीर के अंगों के साथ छेड़छाड़, आज भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी बाधा बनी हुई हैं। हालांकि, अहमदाबाद सिविल अस्पताल में हुआ यह प्रत्यारोपण स्पष्ट करता है कि अंगदान न केवल सुरक्षित है, बल्कि एक मानवीय कर्तव्य है। एक अंग दाता अपने अंगों के दान से एक या दो नहीं, बल्कि आठ जिंदगियों को नई रोशनी दे सकता है।

चिकित्सा प्रक्रिया और जीवन का नया चक्र

अंगदान की प्रक्रिया एक लंबी कानूनी और चिकित्सा श्रृंखला का हिस्सा है। जब वचनारामजी ने सहमति दी, तो अस्पताल की 'ट्रांसप्लांट समन्वय टीम' ने पूरी प्रक्रिया का संचालन किया। लीवर और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों को शरीर से निकालने के बाद उन्हें एक निश्चित समय सीमा (Gold Hour) के भीतर प्राप्तकर्ता के शरीर में प्रत्यारोपित करना होता है।

मोवनदेवी के अंगों ने तीन परिवारों की उम्मीदों को फिर से जीवित किया है। जिन लोगों को ये अंग मिले, उनके लिए यह केवल एक चिकित्सा उपचार नहीं, बल्कि पुनर्जन्म जैसा है। मोवनदेवी का परिवार आज भले ही अपनी प्रिय सदस्य को खो चुका है, लेकिन उन्हें इस बात का संतोष है कि उनकी पत्नी के अंग अब कहीं और धड़क रहे हैं।

निष्कर्ष

मोवनदेवी बागरी की कहानी हमें यह सिखाती है कि मृत्यु केवल जीवन का अंत नहीं है। यदि हम चाहें, तो अपने जाते हुए भी किसी दूसरे के घर के चिराग को जलता रख सकते हैं। जालोर के एक छोटे से गांव से उठी यह प्रेरणादायक आवाज देश के हर कोने तक पहुंचनी चाहिए। अंगदान की दिशा में उठाया गया यह छोटा सा कदम न केवल तीन लोगों की जान बचाता है, बल्कि मानवता के प्रति हमारे विश्वास को और अधिक दृढ़ करता है। आज मोवनदेवी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी धड़कनें किसी और के शरीर में उनकी परोपकारी कहानी को निरंतर कह रही हैं। हमें भी अंगदान को एक आंदोलन के रूप में अपनाना होगा ताकि मृत्यु के बाद भी जीवन का कारवां चलता रहे।