मानवीय संवेदनाओं का अंत: सिस्टम की लाचारी

"वो तड़प रही है, कोई तो देख लो, प्लीज कोई तो मदद करो!" यह चीख किसी फिल्म का डायलॉग नहीं, बल्कि राजस्थान के एक सरकारी अस्पताल की उस वीभत्स सच्चाई का हिस्सा है, जिसने एक बार फिर चिकित्सा जगत को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक एंबुलेंसकर्मी अस्पताल के गलियारों में हाथ-पैर जोड़कर डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ से मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन वहां मौजूद सिस्टम और जिम्मेदार लोगों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अंततः, उस महिला ने अस्पताल की दहलीज पर ही दम तोड़ दिया, जिसे समय पर उपचार मिलता तो शायद आज वह जीवित होती।

यह घटना केवल एक मरीज की मौत नहीं है, बल्कि उस संवेदनहीनता का प्रतीक है जो अक्सर हमारे सरकारी अस्पतालों के गलियारों में गूंजती है। जब एक एंबुलेंसकर्मी, जो खुद मरीजों को बचाने के लिए चौबीसों घंटे सड़क पर दौड़ता है, उसे मदद के लिए गिड़गिड़ाना पड़े, तो यह साफ हो जाता है कि हमारे स्वास्थ्य तंत्र की जड़ें कितनी खोखली हो चुकी हैं।

चिकित्सा क्षेत्र में लापरवाही और मरीजों का दर्द

अस्पताल में भर्ती होने की प्रक्रिया और प्रोटोकॉल के नाम पर अक्सर मरीजों को घंटों इंतजार कराया जाता है। इस मामले में भी यही हुआ। महिला गंभीर स्थिति में थी, उसे 'गोल्डन ऑवर' (दुर्घटना के बाद का सबसे महत्वपूर्ण समय) में इलाज की सख्त आवश्यकता थी। लेकिन, अस्पताल के कर्मचारियों की प्राथमिकता मरीज की जान बचाने से ज्यादा अपनी फाइलों और नियमों को पूरा करने में दिखी।

राजस्थान के कई जिलों, विशेषकर जयपुर जैसे बड़े केंद्रों में जब हम अस्पतालों की स्थिति देखते हैं, तो भीड़ और संसाधनों की कमी का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। क्या वाकई संसाधनों की कमी है, या फिर यह पूरी तरह से 'इच्छाशक्ति' और 'मानवीय संवेदना' का अभाव है? एंबुलेंसकर्मी का वह वीडियो, जिसमें वह बिलखते हुए मदद मांग रहा था, यह दिखाता है कि कैसे एक व्यक्ति सिस्टम के आगे पूरी तरह असहाय महसूस कर रहा था। यह महज एक हादसा नहीं है, इसे चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी विफलता माना जाना चाहिए।

क्या राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था बीमार है?

सरकारी अस्पतालों में अक्सर मरीजों के परिजनों को यह सुनने को मिलता है कि 'डॉक्टर अभी राउंड पर हैं' या 'अभी शिफ्ट चेंज हो रही है'। ये बहाने तब और भी घातक हो जाते हैं जब मामला किसी की जिंदगी और मौत के बीच का हो। एंबुलेंसकर्मी ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी, उसने महिला को अस्पताल तक पहुँचाया, लेकिन अस्पताल के भीतर की 'दीवार' वह नहीं लांघ सका।

राजस्थान में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकारें बड़े-बड़े दावे करती हैं। मुफ्त दवा योजना, आधुनिक उपकरण और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की बातें अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। लेकिन, जब एक एंबुलेंसकर्मी को मदद के लिए चिल्लाना पड़े और कोई सुनने वाला न हो, तो ये तमाम दावे बेमानी हो जाते हैं। इस तरह की घटनाएं राज्य की छवि को धूमिल करती हैं और आम जनता का सरकारी अस्पतालों से भरोसा उठा देती हैं। क्या इसे लापरवाही की श्रेणी में रखकर अपराध के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए? यदि समय पर इलाज न मिलने से किसी की जान जाती है, तो इसके लिए सीधे तौर पर ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ और प्रशासन जिम्मेदार है।

जवाबदेही कौन तय करेगा?

इस घटना के बाद जांच के आदेश, निलंबन और कमेटी गठित करने जैसे शब्द सुनने को मिलेंगे। कुछ दिनों तक शोर मचेगा और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा। लेकिन, सवाल यह है कि उस महिला के परिवार को क्या मिला? क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी? क्या उस महिला की जान वापस आ सकती है?

जवाबदेही का मतलब सिर्फ किसी छोटे कर्मचारी को निलंबित करना नहीं होता। जवाबदेही का अर्थ है उस पूरी कार्यप्रणाली में बदलाव लाना, जहाँ मरीज को 'नंबर' नहीं बल्कि 'इंसान' समझा जाए। अस्पतालों में इमरजेंसी प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन होना चाहिए। अगर कोई मरीज गंभीर अवस्था में आए, तो कागजी कार्रवाई बाद में, इलाज पहले होना चाहिए। यही मेडिकल एथिक्स का पहला नियम है।

निष्कर्ष

अंत में, यह घटना राजस्थान के स्वास्थ्य ढांचे के लिए एक आईना है। एक एंबुलेंसकर्मी की गुहार का अनसुना रह जाना यह साबित करता है कि हम तकनीकी रूप से शायद आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन मानवीय मूल्यों में लगातार पिछड़ रहे हैं। अस्पताल सेवा का मंदिर माने जाते हैं, लेकिन अगर वहां से 'इंसानियत' गायब हो जाए, तो वे केवल इमारतें बनकर रह जाते हैं। समय आ गया है कि प्रशासन इस मामले में दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करे ताकि भविष्य में किसी और को इस तरह की बेबसी का सामना न करना पड़े। हर जान कीमती है, और इस जान की कीमत सिस्टम को चुकानी ही होगी।