राजस्थान का थार मरुस्थल न केवल अपनी कठोर जलवायु के लिए जाना जाता है, बल्कि यह वन्यजीवों की एक अनोखी और दुर्लभ प्रजातियों का घर भी है। इसी कड़ी में, बाड़मेर जिले में वन विभाग द्वारा वन्यजीवों की वार्षिक गणना का कार्य युद्ध स्तर पर शुरू किया गया है। यह प्रक्रिया महज एक गिनती नहीं है, बल्कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के स्वास्थ्य को जांचने का एक वैज्ञानिक पैमाना है। भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच, वन विभाग की टीमें जिले के विभिन्न क्षेत्रों में तैनात हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि रेगिस्तान के इन मूक निवासियों की संख्या और उनके रहन-सहन में क्या बदलाव आए हैं।

वॉटर होल गणना: क्या है यह वैज्ञानिक तरीका?

वन्यजीवों की गणना के लिए वन विभाग मुख्य रूप से 'वॉटर होल' (Water Hole) तकनीक का उपयोग करता है। रेगिस्तान में पानी के स्रोत बेहद सीमित होते हैं, और भीषण गर्मी के दौरान सभी वन्यजीव अपनी प्यास बुझाने के लिए इन्हीं जल स्रोतों का रुख करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से, यह स्थान वन्यजीवों की गणना के लिए सबसे उपयुक्त होता है।

इस प्रक्रिया में, विभाग द्वारा चिन्हित किए गए करीब 40 वॉटर पॉइंट्स पर विशेष टीमें तैनात की जाती हैं। ये टीमें 24 घंटे की शिफ्ट में काम करती हैं। गणना के दौरान, वन कर्मी मचान या छिपने के गुप्त स्थानों से पानी पीने आने वाले जानवरों पर पैनी नजर रखते हैं। इसमें केवल आंखों से देखकर की गई गिनती ही नहीं, बल्कि आधुनिक उपकरणों का भी सहारा लिया जाता है। टीम के सदस्य जानवरों के पैरों के निशान (Pugmarks), उनके द्वारा छोड़ी गई लीद, और उनकी आवाजों के आधार पर डेटा तैयार करते हैं। इसके अलावा, जहां संभव हो, वहां फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए साक्ष्य जुटाए जाते हैं, ताकि गणना में सटीकता बनी रहे।

पूर्णिमा की रात का महत्व और गणना की प्रक्रिया

वन्यजीव गणना के लिए अक्सर 'बुद्ध पूर्णिमा' के आसपास की तारीखों को चुना जाता है। इसके पीछे एक ठोस वैज्ञानिक कारण है। पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी अधिक होती है, जिससे जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों में दृश्यता (Visibility) बेहतर रहती है। कई वन्यजीव निशाचर होते हैं, यानी वे दिन की गर्मी से बचने के लिए रात में सक्रिय होते हैं।

पूर्णिमा की रात को जंगल शांत होते हैं और पानी के स्रोतों पर वन्यजीवों की आवाजाही अधिक होती है। ऐसे में वन विभाग के कर्मचारियों के लिए जानवरों को पहचानना और उनकी संख्या दर्ज करना आसान हो जाता है। यह गणना केवल यह नहीं बताती कि कितने जानवर हैं, बल्कि यह भी दर्शाती है कि मौसम के बदलते मिजाज का इन जीवों पर क्या असर पड़ा है। क्या जल स्रोतों के पास इनकी संख्या कम हुई है? क्या किसी विशेष प्रजाति का प्रवास बढ़ा है? इन सभी सवालों के जवाब इसी गणना से मिलते हैं।

रेगिस्तान की चुनौतियों और वन्यजीवों का संघर्ष

बाड़मेर जैसे शुष्क इलाके में वन्यजीवों के लिए जीवन आसान नहीं है। चिनकारा, रेगिस्तानी बिल्ली, लोमड़ी और विभिन्न प्रकार के पक्षी भीषण गर्मी का सामना करते हैं। वॉटर पॉइंट्स पर होने वाली यह गणना हमें यह समझने में मदद करती है कि क्या ये जल स्रोत वन्यजीवों के लिए पर्याप्त हैं या उन्हें और अधिक संरक्षण की आवश्यकता है।

जब तापमान 45-48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो पानी के स्रोतों की भूमिका और भी बढ़ जाती है। गणना के दौरान टीमें यह भी देखती हैं कि क्या जल स्रोतों में पर्याप्त पानी है या उन्हें भरने की आवश्यकता है। यह जानकारी वन विभाग को भविष्य की कार्ययोजना बनाने में मदद करती है, जिससे वन्यजीवों के लिए सुरक्षित गलियारे और पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। यह डेटा आने वाले समय में पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में नई नीतियां बनाने का आधार भी बनता है।

निष्कर्ष

बाड़मेर में चल रही वन्यजीव गणना केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है। जब हम इन मूक जीवों की संख्या और उनकी आदतों को समझते हैं, तो हम उन्हें बचाने के लिए बेहतर निर्णय ले पाते हैं। वन विभाग की इस कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उद्देश्य भविष्य में आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहना है। यह गणना हमें याद दिलाती है कि रेगिस्तान की कठिन परिस्थितियों में भी जीवन की डोर कितनी मजबूत है और इसे संरक्षित रखना हमारा सामूहिक कर्तव्य है।