सीकर जिले के खाचरियावास का सेठ रामकुमार धूत सरकारी स्कूल। एक ऐसा संस्थान जहाँ बच्चों को भविष्य संवारने का सपना देखना चाहिए था, वहां आज सन्नाटा पसर गया है। पिछले कुछ समय में 50 से अधिक छात्रों ने इस स्कूल से अपनी टीसी (ट्रांसफर सर्टिफिकेट) कटवा ली है। यह पलायन किसी बेहतर स्कूल की तलाश में नहीं, बल्कि अपने ही स्कूल के वातावरण से त्रस्त होकर हुआ है। स्कूल के आसपास फैली भीषण गंदगी, मृत पशुओं के अवशेष और आवारा कुत्तों का आतंक छात्रों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है।
गंदगी का साम्राज्य और बच्चों का पलायन
किसी भी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ाई का माहौल सबसे पहली प्राथमिकता होती है, लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल विपरीत है। स्कूल के ठीक पास स्वास्थ्य केंद्र और खुले मैदान होने के बावजूद, वहां फैली गंदगी ने पढ़ने-लिखने के माहौल को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय डरते हैं। जब बच्चे स्कूल के गेट पर पहुंचते हैं, तो उन्हें किताबों की महक के बजाय मृत पशुओं की सड़ांध का सामना करना पड़ता है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब आवारा कुत्तों का झुंड स्कूल परिसर के आसपास डेरा जमा लेता है। छोटे बच्चों के लिए यह शारीरिक सुरक्षा का बड़ा खतरा बन गया है। जब शिक्षा के मंदिर में ही बच्चों को असुरक्षा और गंदगी का सामना करना पड़े, तो माता-पिता का अपने बच्चों को वहां से हटा लेना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। इस पलायन ने स्कूल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही का सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा पहलू स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायतों की चुप्पी है। सीकर जैसे जिले में, जहां शिक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, वहां इस तरह की बुनियादी समस्याओं का समाधान न होना बेहद चिंताजनक है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार पंचायत स्तर पर अपनी शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन हर बार उन्हें कोरे आश्वासन ही मिले।
स्वच्छता अभियान के इस दौर में, एक सरकारी स्कूल के पास खुले में कचरा और मृत पशुओं का फेंका जाना सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। यह केवल एक स्कूल का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति बरती जा रही घोर लापरवाही का मामला है। क्या पंचायत प्रशासन इस बात का इंतजार कर रहा है कि कोई बड़ी अनहोनी हो, तब जाकर वे हरकत में आएंगे? जनता का आक्रोश अब सड़कों पर आने को मजबूर है, क्योंकि जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ने उनकी सहनशीलता की हदें पार कर दी हैं।
वीआईपी क्षेत्र के पास ऐसी दुर्दशा?
हैरानी की बात यह है कि जिस इलाके में यह स्कूल स्थित है, वहां पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत का स्मारक और खेल मैदान भी मौजूद है। यह क्षेत्र ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में, इस वीआईपी इलाके के पास इतनी गंदगी का होना प्रशासन की कार्यक्षमता पर एक बड़ा धब्बा है।
आमतौर पर, वीआईपी मूवमेंट और स्मारकों के आसपास के क्षेत्रों में स्वच्छता और रखरखाव को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन यहां जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि यदि एक स्मारक के पास की सफाई व्यवस्था ऐसी है, तो बाकी इलाकों का क्या हाल होगा? यह स्थिति स्थानीय राजनीति और विकास के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।
निष्कर्ष
सीकर के खाचरियावास का यह मामला केवल एक स्कूल के 50 बच्चों के टीसी कटवाने का नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है जो बच्चों के भविष्य और उनके स्वास्थ्य के प्रति असंवेदनशील हो चुकी है। जब तक प्रशासन इस मामले को गंभीरता से नहीं लेगा और ठोस कदम नहीं उठाएगा, तब तक न केवल स्कूल की साख गिरेगी, बल्कि वहां बचे हुए अन्य बच्चों का भविष्य भी अंधकार में रहेगा। प्रशासन को तत्काल प्रभाव से स्वच्छता अभियान चलाकर स्कूल के आसपास का माहौल ठीक करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। शिक्षा का अधिकार सुरक्षित वातावरण में ही फलीभूत होता है, और यह सुनिश्चित करना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है।





