नीट (NEET) परीक्षा में हुए कथित पेपर लीक का मामला अब राजस्थान की सीमाओं को पार करते हुए एक बड़े संगठित अपराध की परतें खोल रहा है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की टीम इस घोटाले की तह तक पहुँचने के लिए लगातार सक्रिय है। जांच की सुई अब सीधे राजस्थान के दौसा स्थित पंडित नवल किशोर शर्मा राजकीय मेडिकल कॉलेज पर आकर रुक गई है। इस पूरे प्रकरण में मुख्य आरोपी मांगीलाल बिंवाल की बेटी प्रगति बिंवाल का कॉलेज से रहस्यमयी ढंग से गायब होना, जांच अधिकारियों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।

सीबीआई की नजर में दौसा मेडिकल कॉलेज और रहस्यमयी गायब छात्रा

जांच के दौरान सीबीआई की टीम जब दौसा मेडिकल कॉलेज पहुंची, तो उन्हें एक बड़ा झटका लगा। मुख्य आरोपी मांगीलाल बिंवाल की बेटी और एमबीबीएस प्रथम वर्ष की छात्रा प्रगति बिंवाल न केवल क्लास से अनुपस्थित थी, बल्कि कॉलेज प्रशासन के पास भी उसके बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं थी।

प्रगति ने 13 मई को 20 मई तक का अवकाश (Leave) लिया था। नियम के अनुसार, उसे 21 मई को कॉलेज में उपस्थिति दर्ज करानी थी, लेकिन वह नहीं लौटी। जब अधिकारियों ने उसके जमवारामगढ़ स्थित पैतृक आवास पर संपर्क किया, तो वहां भी सन्नाटा पसरा मिला। सीबीआई अब इस बात की पुष्टि कर रही है कि क्या प्रगति ने जानबूझकर जांच एजेंसियों से बचने के लिए खुद को भूमिगत (Underground) कर लिया है। अधिकारियों का मानना है कि यदि वह निर्दोष होती, तो उसका इस तरह से गायब होना किसी भी स्थिति में तर्कसंगत नहीं है।

अकादमिक रिकॉर्ड में विसंगति: 2021 से 2025 तक का संदेह

जांच एजेंसी केवल प्रगति की शारीरिक उपस्थिति की ही तलाश नहीं कर रही है, बल्कि उसके शैक्षणिक इतिहास को भी एक माइक्रोस्कोप की तरह देख रही है। सीबीआई उन सभी दस्तावेजों की गहन पड़ताल कर रही है, जो 2021 से 2025 के बीच प्रगति के नाम पर जारी हुए हैं।

इस संदेह के पीछे एक ठोस कारण है। प्रगति का 2021 का अकादमिक रिकॉर्ड, जब उसे कोरोना महामारी के दौरान राजस्थान बोर्ड द्वारा प्रमोट किया गया था, बेहद चौंकाने वाला है। उस समय उसे 90 प्रतिशत अंक मिले थे। इसके विपरीत, जब उसने नीट-2025 की परीक्षा दी, तो उसका प्रदर्शन गिरकर 720 में से 385 अंकों पर सिमट गया। हालांकि, इसी स्कोर पर उसका चयन एससी (SC) श्रेणी के अंतर्गत हो गया। अब सीबीआई के विशेषज्ञ यह जांचने में जुटे हैं कि क्या इन चार वर्षों के अंतराल में उसकी पढ़ाई और परीक्षा परिणामों में कोई डिजिटल या मैनुअल छेड़छाड़ की गई है।

नीट विवाद का व्यापक परिप्रेक्ष्य और सीबीआई की कार्यप्रणाली

यह मामला केवल एक छात्रा या एक परिवार तक सीमित नहीं है। नीट परीक्षा के हालिया विवादों ने पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां कुछ महत्वपूर्ण बिंदु समझना आवश्यक है, जो इस केस की गंभीरता को और बढ़ाते हैं:

  1. एनटीए (NTA) की भूमिका पर सवाल: नीट का संचालन करने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) पर भी देशभर से सवाल उठ रहे हैं। सीबीआई अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा मानकों के साथ समझौता किया गया था या सिस्टम में कहीं बाहरी सेंधमारी हुई थी।
  2. सॉल्वर गैंग का नेटवर्क: आमतौर पर ऐसे बड़े घोटालों में 'सॉल्वर गैंग' (डमी परीक्षार्थियों) का इस्तेमाल किया जाता है। सीबीआई के फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या प्रगति या उसके संपर्क में रहे अन्य अभ्यर्थियों ने ऐसे किसी नेटवर्क की मदद ली थी, जो परीक्षा के दौरान पेपर लीक करने या डमी बैठाने में माहिर हो।
  3. डिजिटल फुटप्रिंट्स: सीबीआई केवल कागजों की जांच नहीं कर रही है, बल्कि आरोपियों के पिछले 6 महीने के डिजिटल फुटप्रिंट्स, फोन कॉल्स, और फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन को भी खंगाल रही है। आधुनिक जांच पद्धति में यह देखा जाता है कि संदिग्धों ने परीक्षा से ठीक पहले किन लोगों से संपर्क किया था।

अपराध का सिंडिकेट: लग्जरी गाड़ियां और महंगी जीवनशैली

जांच के दौरान सीबीआई ने आरोपियों के फार्महाउसों और उनके अन्य ठिकानों पर जब दबिश दी, तो वहां से बरामद लग्जरी गाड़ियां और अन्य महंगी वस्तुएं यह संकेत देने के लिए काफी थीं कि यह कोई छोटा-मोटा अपराध नहीं है। यह एक व्यवस्थित सिंडिकेट है, जिसमें सफेदपोश लोग भी शामिल हो सकते हैं। सीबीआई अब केवल प्रगति ही नहीं, बल्कि उसके भाई और परिवार के उन सभी सदस्यों के वित्तीय स्रोतों की जांच कर रही है, जो इस सिंडिकेट का हिस्सा हो सकते हैं।

निष्कर्ष

नीट पेपर लीक मामले ने न केवल उन लाखों मेधावी छात्रों का मनोबल तोड़ा है, जो दिन-रात एक करके मेहनत करते हैं, बल्कि यह शिक्षा प्रणाली के लिए एक बड़ा 'वेक-अप कॉल' भी है। प्रगति बिंवाल का गायब होना यह दर्शाता है कि कानून के शिकंजे से बचने के लिए आरोपी हर संभव हथकंडा अपना रहे हैं। हालांकि, सीबीआई का इतिहास बताता है कि एक बार जब जांच एजेंसियां किसी संगठित गिरोह का पीछा करना शुरू करती हैं, तो डिजिटल डेटा और फॉरेंसिक साक्ष्य आरोपियों के छिपने के रास्तों को भी बंद कर देते हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह केवल एक छात्रा की गैर-मौजूदगी है या किसी बहुत बड़े रैकेट का पर्दाफाश।