कबाड़ से कमाई, रेलवे का नया कीर्तिमान
भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण के दौर में जोधपुर रेल मंडल ने एक नई मिसाल पेश की है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान रेलवे ने अपनी कार्यकुशलता और आर्थिक प्रबंधन का बेहतरीन उदाहरण देते हुए कबाड़ (स्क्रैप) की बिक्री से रिकॉर्ड 58 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 300 प्रतिशत की भारी वृद्धि को दर्शाता है।
रेलवे के लिए कबाड़ केवल बेकार सामान नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण संसाधन है। समय-समय पर पटरियों के नवीनीकरण और बुनियादी ढांचे के बदलाव के दौरान भारी मात्रा में लोहा, पुरानी केबल और अन्य धातुएं निकलती हैं। जोधपुर मंडल ने इस बार 16,500 मीट्रिक टन स्क्रैप का निपटान करके यह बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यह सफलता दर्शाती है कि रेलवे किस तरह से अपने पुराने संसाधनों को सही तरीके से पुनर्चक्रित (recycle) करके देश के व्यापार और अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहा है।
सुरक्षा और स्वच्छता का दोहरा लाभ
जोधपुर रेल मंडल द्वारा की गई यह कवायद केवल आर्थिक मुनाफे तक सीमित नहीं है। कबाड़ हटने से सबसे बड़ा फायदा सुरक्षा और स्वच्छता के मोर्चे पर हुआ है। रेलवे यार्ड्स और पटरियों के किनारे जमा रहने वाला कबाड़ अक्सर कई समस्याओं की जड़ होता है। पुराने लोहे के ढेर और बेकार पड़ी केबल कई बार आग लगने का कारण बन सकते हैं या फिर रेल कर्मचारियों की आवाजाही में बाधा पैदा करते हैं।
जोधपुर रेल मंडल के अधिकारियों के अनुसार, यार्ड्स और पटरियों से इन अनावश्यक सामग्रियों को हटाने से दुर्घटनाओं का जोखिम काफी कम हुआ है। जब पटरियों के आसपास का क्षेत्र साफ-सुथरा होता है, तो मेंटेनेंस का काम करने वाली टीमों के लिए काम करना आसान हो जाता है और ट्रेनों की आवाजाही पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह 'स्वच्छ रेल, सुरक्षित रेल' के विजन को धरातल पर उतारने जैसा है। साफ-सुथरे स्टेशन और यार्ड न केवल यात्रियों के लिए बेहतर अनुभव प्रदान करते हैं, बल्कि रेलवे की कार्यप्रणाली में भी पारदर्शिता लाते हैं।
ई-ऑक्शन से मिली पारदर्शिता
इस सफलता के पीछे एक बड़ी तकनीक और प्रक्रियात्मक बदलाव का हाथ है। पहले कबाड़ की बिक्री में पारदर्शिता को लेकर अक्सर सवाल उठते थे, लेकिन अब ई-ऑक्शन (E-Auction) के माध्यम से पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया गया है। रेलवे के डिजिटल पोर्टल के जरिए अब देश भर के बोलीदाता इसमें हिस्सा ले सकते हैं। इससे किसी भी तरह के बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है और रेलवे को अपने कबाड़ का सही और उचित बाजार मूल्य मिल रहा है।
ई-ऑक्शन की प्रक्रिया ने यह सुनिश्चित किया है कि हर टन स्क्रैप का रिकॉर्ड रहे। वित्त वर्ष 2025-26 में मिली यह भारी सफलता इसी डिजिटल क्रांति का परिणाम है। रेलवे अब केवल अपनी मुख्य सेवा यानी परिवहन पर ही ध्यान नहीं दे रहा, बल्कि गैर-संचालन कार्यों (non-operational tasks) को भी कुशलतापूर्वक प्रबंधित कर रहा है।
रेलवे का 'जीरो स्क्रैप' मिशन
भारतीय रेलवे ने पिछले कुछ वर्षों में 'जीरो स्क्रैप' मिशन पर विशेष जोर दिया है। इसका उद्देश्य न केवल राजस्व बढ़ाना है, बल्कि रेलवे की जमीनों को भी अतिक्रमण और गंदगी से मुक्त रखना है। जोधपुर रेल मंडल की यह 58 करोड़ रुपये की कमाई इसी व्यापक मिशन का एक हिस्सा है। रेलवे का मानना है कि यदि समय पर कबाड़ का निपटान कर दिया जाए, तो न केवल रेलवे के खजाने में धन आएगा, बल्कि रेलवे की परिसंपत्तियों का भी बेहतर उपयोग हो सकेगा।
आने वाले समय में भी रेलवे अपने सभी मंडलों में इसी तरह की प्रक्रिया को और तेज करने की योजना बना रहा है। जोधपुर मंडल ने जिस तरह से 300 फीसदी की वृद्धि दर्ज की है, वह अन्य मंडलों के लिए एक मॉडल बन गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सही प्रबंधन और तकनीक के इस्तेमाल से किसी भी सरकारी विभाग की कार्यक्षमता को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।
निष्कर्ष
जोधपुर रेल मंडल की यह उपलब्धि भारतीय रेलवे के बदलते स्वरूप को दर्शाती है। कबाड़ से 58 करोड़ रुपये कमाना सिर्फ एक वित्तीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा, स्वच्छता और बेहतर प्रबंधन की जीत है। 16,500 मीट्रिक टन स्क्रैप का सफल निपटान यह साबित करता है कि अगर रेलवे की मशीनरी सही दिशा में काम करे, तो राजस्व के नए स्रोत आसानी से खोजे जा सकते हैं। आने वाले समय में, यह मॉडल न केवल रेलवे की आय बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि पटरियों और यार्ड्स को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने में भी अहम भूमिका निभाएगा।
