राजधानी जयपुर की मंडियों में इन दिनों फलों की खरीदारी करना आम उपभोक्ताओं के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। भीषण गर्मी और बाजार में आवक (सप्लाई) की कमी के कारण फलों की कीमतों में अचानक भारी उछाल आया है। मुहाना मंडी से लेकर शहर के स्थानीय ठेलों तक, हर जगह फलों के दाम सामान्य से 20 से 50 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गए हैं। यह महंगाई न केवल आम आदमी की थाली से फल गायब कर रही है, बल्कि व्यापार जगत में भी चिंता का माहौल पैदा कर दिया है।
भीषण गर्मी और सप्लाई चेन का संकट
फलों की कीमतों में इस अचानक वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण राजस्थान में पड़ रही भीषण गर्मी और उसके चलते परिवहन व्यवस्था में आई रुकावटें हैं। फल बेहद नाजुक वस्तुएं हैं, जिन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के लिए 'कोल्ड चेन' यानी ठंडे वातावरण की आवश्यकता होती है। भीषण गर्मी के कारण परिवहन के दौरान ही फलों के खराब होने की दर बढ़ गई है, जिससे मंडियों में पहुँचने वाले माल की कुल मात्रा में भारी कमी आई है।
इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के हालातों ने भी सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। विदेशी फलों के आयात में देरी हो रही है, जिससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो गई है। मांग अधिक है और आपूर्ति सीमित, जिसका सीधा असर कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई दे रहा है। ढुलाई का खर्च बढ़ने और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने भी माल की लागत में इजाफा कर दिया है, जिसका बोझ अंततः खरीदार पर पड़ रहा है।
सेब और कीवी की कीमतों में भारी उछाल
सर्वाधिक असर उन फलों पर पड़ा है जो मुख्य रूप से आयातित (Imported) हैं। विशेषकर ईरानी कीवी और विदेशी सेब के दाम तो दोगुने से भी अधिक हो गए हैं। कुछ समय पहले तक जो कीवी आम लोगों की पहुंच में थी, अब वह एक लग्जरी वस्तु बन गई है। सेब की विभिन्न किस्मों में भी 40 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है।
व्यापारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन फलों की जो खेप भारत पहुँच रही है, वह काफी महंगी पड़ रही है। इसके साथ ही, स्थानीय बाजार में स्टॉकिस्टों ने भी अपनी जमा-पूंजी और जोखिम को देखते हुए कीमतों को ऊंचे स्तर पर रखा है। यह केवल विदेशी फलों तक सीमित नहीं है; स्थानीय स्तर पर मिलने वाले मौसमी फल भी अब पहले की अपेक्षा काफी महंगे बिक रहे हैं, जिससे मध्यमवर्गीय परिवार भी अब फलों की टोकरी बनाने से पहले दो बार सोचने को मजबूर हैं।
छोटे विक्रेताओं और उपभोक्ताओं का हाल
फलों की इस महंगाई का सबसे बुरा असर छोटे फल विक्रेताओं पर पड़ रहा है। जो फेरीवाले या ठेले वाले रोजाना फल बेचकर अपना गुजारा करते थे, उनका मुनाफा आधा रह गया है। ग्राहकों की संख्या में कमी आने से उनका माल बिक नहीं पा रहा है, और यदि माल नहीं बिकता है तो गर्मी के कारण वह जल्दी खराब भी हो जाता है, जिससे उन्हें सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
उपभोक्ताओं का कहना है कि पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे परिवारों के लिए अब फलों का सेवन करना भी मुश्किल हो गया है। स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माने जाने वाले फल अब आम आदमी की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। कई खरीदारों ने अपनी खरीदारी की मात्रा को सीमित कर दिया है, जिससे बाजार में सन्नाटा पसरा हुआ है।
निष्कर्ष
जयपुर के फल बाजारों की यह स्थिति दर्शाती है कि वैश्विक सप्लाई चेन में छोटा सा बदलाव भी स्थानीय बाजारों में कितनी बड़ी हलचल पैदा कर सकता है। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति सामान्य नहीं होती और स्थानीय परिवहन व्यवस्था में सुधार नहीं होता, तब तक कीमतों में राहत मिलने की संभावना कम ही नजर आती है। व्यापारियों और उपभोक्ताओं दोनों को ही इस कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा है। फिलहाल, आम आदमी को उम्मीद है कि प्रशासन और मंडी समितियां इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाएंगी ताकि फलों की कीमतों पर लगाम लग सके और बाजार में फिर से सुचारू रूप से रौनक लौट सके।





