राजस्थान में आखातीज (अक्षय तृतीया) और पीपल पूर्णिमा का दिन विवाह समारोहों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इन दिनों को 'अबूझ सावे' की श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि विवाह के लिए किसी विशेष मुहूर्त या कुंडली मिलान की आवश्यकता नहीं होती। परंपरा और लोक-मान्यता के कारण इस दौरान शादियों की भारी भीड़ देखी जाती है, लेकिन इसी आड़ में राजस्थान में बाल विवाह जैसी कुप्रथा भी सिर उठाने लगती है। इस बार प्रशासन ने इन दिनों को लेकर विशेष सतर्कता बरती है, जिसका असर अजमेर में देखने को मिला है, जहां जिला प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए दो बाल विवाहों को समय रहते रुकवा दिया।

'अबूझ सावे' की आड़ में पनपती कुप्रथा

'अबूझ सावे' यानी बिना किसी मुहूर्त के विवाह करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में अक्षय तृतीया को किसान अपनी फसलों की कटाई और समृद्धि के साथ जोड़कर देखते हैं। इसी दिन सामूहिक विवाहों का आयोजन भी बड़े स्तर पर होता है। हालांकि, यही शुभ दिन कई बार बाल विवाह के आयोजन का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। जागरूकता की कमी और सामाजिक दबाव के चलते कई परिवार नाबालिग बच्चों का विवाह कर देते हैं।

सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि 'अबूझ सावे' का मतलब केवल विवाह संपन्न करना नहीं, बल्कि इसे जिम्मेदारी के साथ निभाने का अवसर होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश, कुछ लोग इसे कम उम्र में विवाह के लिए 'आसान रास्ता' मान लेते हैं। ऐसे में प्रशासन के लिए यह समय किसी परीक्षा से कम नहीं होता। राजस्थान में बाल विवाह को जड़ से मिटाने के लिए प्रशासन ने अब कई स्तरों पर निगरानी तंत्र विकसित किया है।

प्रशासन की पैनी नजर और मुस्तैदी

राजस्थान के विभिन्न जिलों में जिला कलेक्टर और पुलिस प्रशासन ने आखातीज के मौके पर बाल विवाह रोकने के लिए कंट्रोल रूम स्थापित किए हैं। अजमेर में मिली सूचना के बाद प्रशासन की टीम ने तुरंत हरकत में आते हुए उन परिवारों तक पहुंच बनाई, जहां नाबालिग बच्चों के विवाह की तैयारी चल रही थी। टीम ने न केवल विवाह रुकवाया, बल्कि परिजनों की काउंसलिंग कर उन्हें कानूनी प्रावधानों के बारे में सचेत किया।

बाल विवाह एक गंभीर अपराध है, और इसके खिलाफ सख्त कानून मौजूद हैं। यदि कोई परिवार बाल विवाह आयोजित करता है, तो उस पर भारी जुर्माना और कारावास की सजा का प्रावधान है। प्रशासन की इस सक्रियता का मुख्य उद्देश्य लोगों में कानून का भय पैदा करना और समाज को जागरूक करना है। अक्सर यह देखा जाता है कि पुलिस और प्रशासन की सख्ती के बाद ही लोग ऐसी कुप्रथाओं से तौबा करते हैं। प्रशासन ने आम जनता से भी अपील की है कि यदि उन्हें कहीं भी बाल विवाह की सूचना मिलती है, तो वे तुरंत स्थानीय थाने या प्रशासन के हेल्पलाइन नंबर पर सूचित करें।

बाल विवाह का भविष्य पर दुष्प्रभाव

बाल विवाह केवल एक सामाजिक कुरीति नहीं है, बल्कि यह बच्चों के सुनहरे भविष्य को अंधेरे में धकेलने का जरिया भी है। कम उम्र में विवाह होने से सबसे अधिक प्रभाव लड़की की शिक्षा पर पड़ता है। स्कूल छोड़ने की दर में वृद्धि होती है, जिससे न केवल उनका मानसिक विकास रुक जाता है, बल्कि वे शारीरिक रूप से भी परिपक्व नहीं हो पातीं, जिससे आगे चलकर स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।

एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि बच्चों को विवाह के बंधन में बांधने के बजाय, उन्हें शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाया जाए। जब एक बच्चा शिक्षित होता है, तो वह न केवल अपने परिवार का, बल्कि पूरे समाज और देश का नाम रोशन करता है। अक्षय तृतीया और पीपल पूर्णिमा जैसे त्योहारों का असली उद्देश्य खुशियां बांटना है, न कि किसी के बचपन का गला घोंटना।

निष्कर्ष

आखातीज और पीपल पूर्णिमा पर प्रशासन की सख्ती निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। अजमेर में प्रशासन द्वारा दिखाई गई तत्परता यह दर्शाती है कि शासन बाल विवाह जैसे अपराधों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रहा है। हालांकि, केवल प्रशासन के दम पर इस कुप्रथा को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है। इसमें समाज की भागीदारी अनिवार्य है। जब तक हर नागरिक इस बात को नहीं समझेगा कि बाल विवाह एक अपराध है और यह बच्चों के अधिकारों का हनन है, तब तक इसे पूरी तरह से नहीं रोका जा सकेगा। हमें अपने त्योहारों की शुचिता बनाए रखने के साथ-साथ समाज को भी आधुनिक और प्रगतिशील बनाने की दिशा में प्रयास करने होंगे, ताकि आने वाली पीढ़ियां एक सुरक्षित और शिक्षित वातावरण में सांस ले सकें।