भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में मानसून केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका और देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है। जैसे ही गर्मी का मौसम अपने चरम पर पहुँचता है, देश की निगाहें मानसून की पहली फुहारों पर टिक जाती हैं। हाल ही में, निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी 'स्काईमेट वेदर' (Skymet Weather) ने आगामी मानसून सीजन को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसने नीति निर्माताओं और कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। यह पूर्वानुमान इस बात पर जोर देता है कि मानसून की अनियमितता केवल बारिश की मात्रा ही नहीं, बल्कि उसके समय और वितरण को भी प्रभावित कर सकती है।
मानसून का गणित और स्काईमेट का पूर्वानुमान
स्काईमेट वेदर द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल मानसून के दौरान बारिश सामान्य से 6 फीसदी कम रहने के आसार हैं। एजेंसी ने मानसून के चार महीनों (जून से सितंबर) के लिए देश में कुल बारिश का अनुमान 94 फीसदी जताया है। मौसमी वर्गीकरण के अनुसार, यदि बारिश का स्तर दीर्घकालिक औसत (Long Period Average - LPA) के 90 से 95 प्रतिशत के दायरे में रहता है, तो उसे 'सामान्य से कम' की श्रेणी में रखा जाता है।
भारत में मानसून की बारिश का दीर्घकालिक औसत 868.6 मिलीमीटर निर्धारित किया गया है, जिसकी गणना 1971 से 2020 तक के आंकड़ों के आधार पर की गई है। स्काईमेट का 94 फीसदी का अनुमान इस बात की ओर इशारा करता है कि इस बार बारिश का आंकड़ा इस मानक औसत से नीचे रहेगा। यह पूर्वानुमान उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है, जहाँ सिंचाई के लिए नहरें या भूजल संसाधन पर्याप्त नहीं हैं और किसान पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर हैं।
समय के साथ बदलता मानसून का मिजाज
मानसून का पूर्वानुमान सिर्फ कुल मात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वितरण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्काईमेट के विश्लेषण के अनुसार, मानसून के महीनों में बारिश का वितरण असमान रहने की संभावना है। जून के महीने में मानसून की शुरुआत सामान्य रहने के संकेत हैं, जो खरीफ की बुवाई के लिए एक सकारात्मक शुरुआत हो सकती है। हालांकि, जैसे-जैसे मानसून का सीजन आगे बढ़ेगा, स्थिति चुनौतीपूर्ण होती जाएगी।
जुलाई से बारिश में गिरावट का सिलसिला शुरू हो सकता है, जो अगस्त और सितंबर के महीनों में और अधिक गहरा जाएगा। खासकर अगस्त और सितंबर के दौरान मानसून की सक्रियता में कमी आने के संकेत हैं, जो खड़ी फसलों के लिए चिंता का विषय बन सकता है। यह समय फसल के विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है, और इस दौरान पानी की कमी सीधे तौर पर पैदावार को प्रभावित कर सकती है। मध्य भारत और पश्चिम भारत के कई हिस्से, विशेष रूप से मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा, इस संभावित बारिश की कमी के प्रभाव क्षेत्र में आ सकते हैं।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर मानसून का गहरा प्रभाव
मानसून का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह व्यापक भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में मानसून का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि खरीफ फसलों, जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दलहन की बुवाई पूरी तरह से मानसून की बारिश पर निर्भर करती है।
अतिरिक्त जानकारी के रूप में देखें तो भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग 18-20 प्रतिशत है। यदि बारिश कम होती है, तो उत्पादन में गिरावट आती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार भी अक्सर मानसून के आंकड़ों को मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करने के एक बड़े कारक के रूप में देखते हैं। यदि मानसून के दौरान पर्याप्त बारिश नहीं होती, तो जलाशयों का जलस्तर गिर जाता है, जिससे रबी फसलों की बुवाई के लिए भी पानी की उपलब्धता कम हो जाती है।
जलवायु परिवर्तन और अनिश्चितता का संकट
पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि मानसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण मानसून की पारंपरिक सक्रियता और वापसी की तिथियां भी प्रभावित हो रही हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि समुद्र के बढ़ते तापमान और वैश्विक तापन (Global Warming) के कारण 'अल-नीनो' जैसी घटनाएं अधिक सक्रिय हो रही हैं, जो भारतीय मानसून को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
इसके अलावा, बारिश का वितरण भी असंतुलित हो गया है। कहीं पर सूखा पड़ रहा है, तो कहीं बहुत कम समय में भारी बारिश के कारण बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है। स्काईमेट का यह पूर्वानुमान संकेत देता है कि भले ही कुल बारिश 94 फीसदी रहने का अनुमान है, लेकिन इसका असमान वितरण कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है। किसानों को अब पारंपरिक खेती के तरीके छोड़कर 'क्लाइमेट-स्मार्ट' कृषि की ओर बढ़ने की जरूरत है, ताकि कम बारिश में भी फसल का बचाव किया जा सके।
निष्कर्ष
स्काईमेट वेदर का यह पूर्वानुमान आने वाले महीनों के लिए एक चेतावनी है। यद्यपि 94 फीसदी बारिश को 'सामान्य से कम' की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि स्थिति आपदाजनक होगी। यह रिपोर्ट प्रशासन और किसानों को समय रहते सतर्क होने का अवसर प्रदान करती है। पानी के भंडारण के उचित प्रबंधन, बुवाई के समय में बदलाव और सूखा प्रतिरोधी बीजों के उपयोग से इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। सरकार और नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे जल संरक्षण योजनाओं को प्राथमिकता दें, ताकि मानसून की इस संभावित कमी का असर आम जनता और किसानों की जेब पर कम से कम पड़े।
