राजस्थान के कोटा में एक बार फिर एक युवा सपने ने दम तोड़ दिया। देश भर में डॉक्टर बनने का सपना संजोए लाखों छात्र जब NEET परीक्षा की तैयारियों के अंतिम दौर में थे, तब कोटा से आई एक खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। परीक्षा से महज एक दिन पहले एक छात्र ने अपनी जान दे दी। छात्र द्वारा छोड़ा गया सुसाइड नोट और उसमें लिखी चंद लाइनें— 'मैं उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया'—न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम पर भी सवाल खड़ा करती है, जो छात्रों को केवल अंकों की मशीन बनाने पर तुला है।
CCTV में कैद आखिरी पल और सुसाइड नोट
घटना कोटा के उस इलाके की है जहां कोचिंग संस्थानों की भरमार है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, मृतक छात्र काफी समय से NEET की तैयारी कर रहा था। सीसीटीवी फुटेज में जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं। फुटेज में छात्र को अपने कमरे की ओर जाते हुए देखा जा सकता है, जो उसकी जिंदगी के आखिरी पल साबित हुए।
पुलिस की शुरुआती जांच और कमरे से मिले सुसाइड नोट ने यह साफ कर दिया है कि छात्र मानसिक दबाव में था। उसने अपने नोट में स्पष्ट लिखा है कि वह अपने माता-पिता और खुद से की गई उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका। यह स्वीकारोक्ति उन लाखों छात्रों की उस पीड़ा को बयां करती है, जो कोटा जैसे शिक्षा हब में अपना भविष्य तलाशने आते हैं लेकिन अक्सर खुद को एक कभी न खत्म होने वाली दौड़ में फंसा हुआ पाते हैं।
शिक्षा की नगरी में तनाव का काला सच
कोटा को देश की 'कोचिंग राजधानी' कहा जाता है, जहां हर साल लाखों बच्चे डॉक्टर और इंजीनियर बनने की उम्मीद लेकर आते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, यह शहर 'सपनों की नगरी' के बजाय 'तनाव का केंद्र' बनता जा रहा है। यहाँ का माहौल ऐसा है जहाँ एक-एक अंक की कीमत करोड़ों में आंकी जाती है।
अक्सर देखा गया है कि कोचिंग संस्थानों में सिलेबस पूरा करने की होड़, साप्ताहिक टेस्ट के परिणाम और रैकिंग का मानसिक बोझ छात्रों को तोड़ देता है। कोटा में पढ़ने वाले छात्रों पर सिर्फ पढ़ाई का ही नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के निवेश और समाज में अपनी 'प्रतिष्ठा' बनाए रखने का भी भारी दबाव होता है। यह सिर्फ एक छात्र की मौत नहीं है, बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था की विफलता है जो बच्चों को यह नहीं सिखा पा रही है कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नया अनुभव है।
क्या व्यवस्थागत बदलाव की जरूरत है?
प्रशासन और कोचिंग संस्थानों ने हाल के वर्षों में कई कदम उठाए हैं। पंखों में स्प्रिंग लगाना, नियमित काउंसलिंग और छात्रों के लिए मनोरंजक गतिविधियों का आयोजन—ये सब कोशिशें की गई हैं। लेकिन क्या ये कदम नाकाफी हैं? जब एक छात्र परीक्षा से ठीक एक दिन पहले यह कदम उठाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि उसे काउंसलिंग या सुरक्षात्मक उपकरणों की नहीं, बल्कि भावनात्मक समर्थन की जरूरत थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कोचिंग संस्थानों के भरोसे बच्चों को नहीं छोड़ा जा सकता। माता-पिता को भी समझना होगा कि उनका बच्चा किसी भी परीक्षा या डिग्री से कहीं अधिक मूल्यवान है। जब तक घर और कोचिंग संस्थानों के बीच संवाद का स्तर सकारात्मक नहीं होगा, तब तक इस तरह की दुखद घटनाओं पर पूर्ण विराम लगाना मुश्किल है। छात्रों को यह समझाने की आवश्यकता है कि करियर के अलावा भी जीवन के कई आयाम हैं और एक परीक्षा उनकी योग्यता का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकती।
निष्कर्ष
कोटा की इस घटना ने एक बार फिर समाज के सामने एक आईना रख दिया है। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का दबाव इतना बड़ा नहीं होना चाहिए कि वह एक मासूम की जान ले ले। यह समय कोचिंग माफियाओं की कमाई का हिसाब लगाने से ज्यादा, हमारे बच्चों की मानसिक सेहत पर ध्यान केंद्रित करने का है। हमें एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो रट्टा मारने और रैंक लाने के बजाय, छात्रों को जीवन जीने की कला सिखाए और उन्हें चुनौतियों का सामना करना सिखाए। एक छात्र की मौत पूरे समाज की विफलता है, और यदि अब भी हम नहीं चेते, तो कोटा की इन गलियों में ऐसे और भी दुखद अध्याय लिखे जाते रहेंगे।





