दौसा सिलिकोसिस फर्जीवाड़ा: सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगाने वाला रैकेट बेनकाब
राजस्थान के दौसा जिले में सिलिकोसिस प्रमाण पत्र के नाम पर हुए सुनियोजित घोटाले ने चिकित्सा और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हालिया कार्रवाई में पुलिस ने डॉ. प्रेम कुमार मीना को हिरासत में लिया है। 45 वर्षीय डॉ. मीना कनिष्ठ विशेषज्ञ (मेडिसिन) के पद पर तैनात थे और सिलिकोसिस मामलों की जांच करने वाले मेडिकल बोर्ड के महत्वपूर्ण सदस्य रहे हैं। उनकी गिरफ्तारी के साथ ही इस पूरे सिंडिकेट में अब तक पकड़े गए आरोपियों की संख्या चार हो गई है।
यह घोटाला महज कुछ फर्जी कागजों का मामला नहीं है, बल्कि एक व्यापक भ्रष्टाचार है जिसमें सरकारी संसाधनों और लोक कल्याणकारी योजनाओं का सीधे तौर पर दुरुपयोग किया गया। पुलिस और एसओजी (SOG) की संयुक्त जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि इस रैकेट का मुख्य उद्देश्य सरकारी खजाने से मिलने वाली मुआवजा राशि को हड़पना था।
आंकड़ों के आईने में घोटाले की सच्चाई
नवंबर 2022 में जब सिलिकोसिस कार्ड की प्रक्रिया को पूरी तरह से ऑनलाइन किया गया, तो सरकार को उम्मीद थी कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी। लेकिन, दौसा के आंकड़ों ने इस उम्मीद को चकनाचूर कर दिया। मात्र 10 महीनों की अवधि में दौसा में 2453 सिलिकोसिस कार्ड जारी कर दिए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि यह संख्या पूरे राजस्थान के कुल आंकड़ों का एक बड़ा हिस्सा थी।
इतनी बड़ी संख्या में प्रमाण पत्रों का बनना संदेह के दायरे में था। विशेषज्ञों का मानना है कि सिलिकोसिस एक लाइलाज बीमारी है, जो मुख्य रूप से खदानों में काम करने वाले श्रमिकों में धूल के कणों के फेफड़ों में जाने से होती है। राजस्थान में विशेषकर खनन प्रभावित क्षेत्रों में यह बीमारी देखी जाती है, लेकिन दौसा जैसे जिले में इतनी बड़ी संख्या में मामले मिलना चिकित्सकीय रूप से असामान्य था। इसी संदेह के चलते जांच के आदेश दिए गए।
साजिश का जाल: कैसे काम करता था यह रैकेट?
जांच में सामने आया कि आरोपियों ने बहुत ही चतुराई से एक समानांतर प्रणाली विकसित कर ली थी। इस पूरे नेटवर्क में डॉक्टरों और रेडियोग्राफरों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। आरोप है कि एक ही एक्स-रे रिपोर्ट को अलग-अलग नामों से सॉफ्टवेयर में अपलोड किया जाता था।
सिलिकोसिस की पहचान में एक्स-रे की भूमिका सबसे अहम होती है, और इसी तकनीकी पहलू का फायदा उठाकर फर्जीवाड़ा किया गया। जिन लोगों ने कभी खदानों में कदम भी नहीं रखा था, उन्हें भी इस बीमारी का मरीज बताकर प्रमाण पत्र दिए गए। इस पूरे खेल में 12.39 करोड़ रुपये की सरकारी राशि का दुरुपयोग हुआ है। पीड़ित जो वास्तव में इस जानलेवा बीमारी से जूझ रहे थे, वे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रह गए, जबकि जालसाजों ने फर्जी कागजों के आधार पर राशि का आहरण कर लिया।
जांच का दायरा और आगे की कार्रवाई
इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें केवल दौसा ही नहीं, बल्कि राज्य के अन्य जिलों जैसे करौली, चूरू, सीकर, भीलवाड़ा, और अलवर की भी संलिप्तता सामने आ रही है। कुल 22 डॉक्टरों और रेडियोग्राफरों को इस पूरे प्रकरण में नामजद किया गया है।
पुलिस की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, 30 मार्च को डॉ. मनोज ऊंचवाल, डॉ. डीएन शर्मा और रेडियोग्राफर मनोहर लाल यादव को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। 29 जनवरी 2024 को कोतवाली थाने में दर्ज कराई गई शिकायत के बाद से ही पुलिस की टीमें सबूत जुटाने में लगी थीं। अब डॉ. प्रेम कुमार मीना से पूछताछ के बाद पुलिस को इस नेटवर्क के उन सरगनाओं तक पहुंचने की उम्मीद है, जो इस पूरे घोटाले को पर्दे के पीछे से निर्देशित कर रहे थे।
क्या है सिलिकोसिस नीति और इसका महत्व?
राजस्थान सरकार ने सिलिकोसिस पीड़ितों के लिए एक अत्यंत संवेदनशील नीति बना रखी है, जिसके तहत मरीज को तत्काल सहायता और मृत्यु होने पर आश्रितों को विशेष मुआवजा दिया जाता है। इस योजना का उद्देश्य उन गरीब परिवारों को संबल प्रदान करना है, जिनका मुख्य कमाने वाला सदस्य सिलिकोसिस के कारण असामयिक मौत का शिकार हो जाता है।
इस प्रकार के फर्जीवाड़े न केवल सरकारी खजाने को खाली करते हैं, बल्कि समाज के उस सबसे कमजोर वर्ग के हक पर डाका डालते हैं, जिनके लिए यह योजना जीवन-मरण का सहारा होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन फर्जी प्रमाणपत्रों की जांच समय रहते नहीं होती, तो यह घोटाला और अधिक बड़ा रूप ले सकता था। अब मांग उठ रही है कि उन सभी कार्डों की फिर से फिजिकल वेरिफिकेशन (Physical Verification) कराई जाए जो इस 10 महीने की अवधि में बनाए गए थे।
निष्कर्ष
दौसा का सिलिकोसिस घोटाला यह स्पष्ट करता है कि तकनीकी नवाचार (Online System) तभी सफल हो सकते हैं जब मानवीय नैतिकता और जवाबदेही बनी रहे। एक सरकारी डॉक्टर का इस तरह के अपराध में लिप्त होना चिकित्सा पेशे की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जांच एजेंसियां इस पूरे 'रैकेट' के मास्टरमाइंड तक पहुंच पाएंगी और क्या इन फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर ली गई मुआवजा राशि की वसूली हो सकेगी। न्याय की जीत के लिए आवश्यक है कि दोषियों को कठोरतम दंड मिले ताकि भविष्य में किसी भी योजना के साथ इस तरह का खिलवाड़ करने का साहस न हो।
