मकराना में खनन माफिया की लापरवाही: बंद खदान बनी दो मासूमों की कब्र

डीडवाना-कुचामन जिले के मकराना क्षेत्र में सोमवार का दिन दो परिवारों के लिए कभी न भूलने वाला काला अध्याय बन गया। कुमारी रेंज स्थित एक बंद पड़ी खदान, जो लंबे समय से असुरक्षित और खुली पड़ी थी, दो नाबालिग बच्चों की असमय मौत का कारण बन गई। सोमवार दोपहर करीब 3 बजे हुई यह घटना कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण है। खेलते-कूदते ये मासूम बच्चे मौत के उस कुएं में कब समा गए, किसी को भनक तक नहीं लगी।

यह दुखद घटना केवल एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि मकराना जैसे समृद्ध खनन क्षेत्रों में बरती जा रही गंभीर अनियमितताओं की एक और बानगी है।

मौत के जाल में फंसी मासूमियत

घटनाक्रम के अनुसार, दोपहर का समय था जब दोनों बच्चे अपने घर के पास खेल रहे थे। खेलते-खेलते वे अनजाने में कुमारी रेंज की उस खदान तक पहुंच गए, जिसे वर्षों पहले बंद कर दिया गया था। खदान के गहरे गड्ढे बारिश के पानी और भूजल रिसाव के कारण पानी से लबालब भरे हुए थे। बच्चों को इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि वे खेल के मैदान की जगह मौत के मुहाने पर खड़े हैं। फिसलते ही वे गहरे पानी में गिर गए और बाहर निकलने का कोई रास्ता न मिलने के कारण दम तोड़ दिया।

जब काफी देर तक बच्चे घर नहीं लौटे, तो परिजनों ने उनकी तलाश शुरू की। स्थानीय लोगों की मदद से जब खदान के पास देखा गया, तो सच्चाई सामने आई। हालांकि, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बच्चों के शव पानी से बाहर निकाले गए, जिससे पूरे इलाके में मातम पसर गया।

सुरक्षा नियमों की अनदेखी: केवल कागजों तक सीमित दावे

मकराना विश्व भर में अपने बेशकीमती संगमरमर के लिए जाना जाता है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे खनन क्षेत्रों की हकीकत बेहद धुंधली है। भारतीय खान अधिनियम (MMDR Act) के तहत, किसी भी खदान को बंद करने के बाद उसके मालिक की जिम्मेदारी होती है कि वह उस क्षेत्र को सुरक्षित करे। नियमों के अनुसार, बंद खदानों की बाउंड्री वॉल या फेंसिंग (घेराबंदी) करना अनिवार्य है। साथ ही, वहां 'खतरा' या 'प्रवेश वर्जित' के चेतावनी बोर्ड लगाना आवश्यक है।

दुर्भाग्य से, इस मामले में खनन विभाग और खान मालिक, दोनों के दावे खोखले साबित हुए। घटनास्थल पर न तो कोई सुरक्षा घेरा था और न ही कोई चेतावनी बोर्ड। यह स्थिति प्रशासन की लचर निगरानी और खनन माफियाओं की मनमानी को स्पष्ट करती है। यदि समय रहते इन सुरक्षा मानकों का पालन किया गया होता, तो आज दो परिवार अपने बच्चों को नहीं खोते।

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खनन क्षेत्रों का 'डेडली पैटर्न' और भूजल का खतरा

इस हादसे के पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक और पर्यावरणीय पहलू भी है। मकराना जैसे क्षेत्रों में जहाँ खनन कार्य दशकों से चल रहा है, वहां छोड़ी गई बंद खदानें 'वाटर ट्रैप' (Water Trap) बन जाती हैं। मकराना का भू-गर्भीय ढांचा ऐसा है कि बारिश का पानी जमीन के भीतर जमा हो जाता है, जिससे खदानें गहरे पानी के तालाबों में बदल जाती हैं।

अक्सर खान मालिक मुनाफा कमाने के बाद खदानों को अधूरी छोड़कर चले जाते हैं, जिससे वे क्षेत्र न केवल बच्चों बल्कि मवेशियों और राहगीरों के लिए भी डेथ ट्रैप (Death Trap) बन जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान के खनन क्षेत्रों में ऐसी हजारों अवैध या बंद खदानें हैं, जिनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। यह 'हिडन डेंजर' (Hidden Danger) मकराना की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है, जिसकी अनदेखी बार-बार ऐसे हादसों को जन्म दे रही है।

परिजनों का आक्रोश और कानूनी कार्रवाई

घटना के तुरंत बाद परिजनों का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने खदान मालिक के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए जमकर विरोध प्रदर्शन किया। उनका आरोप है कि यदि प्रशासन ने समय-समय पर खनन क्षेत्रों का ऑडिट किया होता, तो मालिक को खदान सुरक्षित करने के लिए मजबूर किया जा सकता था।

सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया और मामला दर्ज कर लिया है। अब जांच का विषय यह है कि क्या यह खदान अधिकृत रूप से बंद की गई थी? यदि हां, तो सुरक्षा क्यों नहीं की गई? पुलिस का कहना है कि लापरवाही के दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। हालांकि, सवाल यह है कि कार्रवाई से बच्चों की जान तो वापस नहीं आएगी, लेकिन क्या यह कार्रवाई भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त होगी?

निष्कर्ष

मकराना की यह दर्दनाक घटना पूरे जिले के लिए एक चेतावनी है। केवल एक मामला दर्ज कर लेना या किसी छोटे स्तर के कर्मचारी को निलंबित कर देना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। सरकार को चाहिए कि मकराना और आसपास के सभी खनन क्षेत्रों का एक 'सुरक्षा ऑडिट' (Safety Audit) कराए। जो भी खदानें बिना सुरक्षा मानकों के खुली छोड़ी गई हैं, उन्हें तत्काल भरा जाए या घेराबंदी की जाए। जब तक खनन विभाग और प्रशासन अपनी जवाबदेही तय नहीं करेंगे, तब तक ऐसी मासूम जिंदगियां मौत के कुओं में समाती रहेंगी। अब समय आ गया है कि विकास की इस दौड़ में सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।