जयपुर की सांस्कृतिक विरासत में हाथियों का विशेष स्थान है, लेकिन हाल ही में शहर में हुई एक विदेशी फोटोग्राफर की फोटोशूट ने सोशल मीडिया और वन्यजीव प्रेमियों के बीच एक बड़ी बहस छेड़ दी है। इस फोटोशूट में हाथियों को गुलाबी रंग में रंगा गया था, जिसे फोटोग्राफर ने अपनी 'क्रिएटिविटी' करार दिया है। हालांकि, स्थानीय लोगों और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे न केवल पशुओं के प्रति असंवेदनशीलता माना है, बल्कि इसे राजस्थान की परंपराओं का अपमान भी बताया है।

विवाद की जड़: क्या है मामला?

घटना जयपुर के बाहरी इलाके की है, जहां एक विदेशी फोटोग्राफर ने अपने एक प्रोजेक्ट के लिए हाथियों का इस्तेमाल किया। फोटोशूट के दौरान हाथियों के शरीर पर गुलाबी रंग (गुलाल या केमिकल युक्त रंग) लगाया गया था। जैसे ही इस फोटोशूट की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, वैसे ही जयपुर के पशु प्रेमियों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने कड़ी आपत्ति जताना शुरू कर दिया।

आरोप है कि फोटोग्राफर ने अपनी कलात्मक दृष्टि को पूरा करने के लिए बेजुबान जानवरों को घंटों तक धूप में खड़ा रखा और उन पर हानिकारक रंगों का लेप लगाया। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि हाथियों की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है और किसी भी प्रकार का कृत्रिम रंग उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।

पशु सुरक्षा और कानूनों का उल्लंघन

भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत जानवरों को किसी भी प्रकार की शारीरिक पीड़ा देना या उनके प्राकृतिक स्वरूप के साथ छेड़छाड़ करना दंडनीय अपराध है। जयपुर में हाथियों के उपयोग को लेकर पहले भी कई बार विवाद हो चुके हैं, जिसके चलते हाथी गांव (एलिफेंट विलेज) में हाथियों के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं।

इस घटना के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या विदेशी फोटोग्राफर ने स्थानीय प्रशासन से अनुमति ली थी? यदि अनुमति ली गई थी, तो क्या उसमें हाथियों को रंगने जैसी शर्तों का जिक्र था? पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि मनोरंजन के नाम पर जानवरों का उपयोग करना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह ग्लोबल मानकों के भी खिलाफ है।

कला बनाम संवेदनशीलता: एक वैश्विक बहस

यह कोई पहली बार नहीं है जब 'क्रिएटिव फोटोग्राफी' और 'पशु अधिकारों' के बीच टकराव हुआ है। दुनिया भर में कई बार फोटोग्राफर्स ने अपनी तस्वीरों को आकर्षक बनाने के लिए जानवरों के साथ प्रयोग किए हैं, लेकिन हर बार उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है।

जयपुर के कला प्रेमी भी इस बात से सहमत हैं कि कला का मतलब किसी को कष्ट पहुंचाना नहीं होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि आज के दौर में जब डिजिटल एडिटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का युग है, तब हाथियों को वास्तविक रूप से रंगने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। फोटोग्राफर अपनी तस्वीरों को एडिट करके भी वही प्रभाव पैदा कर सकता था, बिना जानवर को तकलीफ पहुंचाए।

निष्कर्ष

जयपुर का गुलाबी शहर होना गर्व की बात है, लेकिन हाथियों को गुलाबी बनाना कला नहीं, बल्कि संवेदनहीनता है। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि पर्यटन और कला की आड़ में हम पशु कल्याण के बुनियादी सिद्धांतों को कैसे नजरअंदाज कर रहे हैं। प्रशासन को इस मामले में कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी विदेशी या स्थानीय कलाकार अपनी रचनात्मकता के नाम पर बेजुबान जानवरों को प्रताड़ित करने का साहस न करे। संस्कृति और कला वही श्रेष्ठ है जो जीव-जंतुओं के प्रति दया और सम्मान का भाव रखती हो।